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	<title>Culture Department &#8211; NewsX 24</title>
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		<title>संस्कृति विभाग ने 14 स्थानों पर आयोजित किए सांस्कृतिक कार्यक्रम, जनजातीय संग्रहालय में संगीत संध्या</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 21 Jun 2026 16:36:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मध्य प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[Culture Department]]></category>
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					<description><![CDATA[भोपाल&#160; विश्व संगीत दिवस के पावन अवसर पर समूचा मध्य प्रदेश नाद-ब्रह्म की अलौकिक स्वर-लहरियों से गुंजायमान हो उठा। संस्कृति विभाग के तत्वावधान में प्रदेश के 14 अंचलों में कला-साधना और सांस्कृतिक सौंदर्य का एक ऐसा अनुपम वितान तना, जिसने युवा पीढ़ी में नई सांस्कृतिक चेतना का संचार कर दिया। शासकीय संगीत एवं ललित कला &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:justify"><strong>भोपाल&nbsp;</strong></p>
<p style="text-align:justify">विश्व संगीत दिवस के पावन अवसर पर समूचा मध्य प्रदेश नाद-ब्रह्म की अलौकिक स्वर-लहरियों से गुंजायमान हो उठा। संस्कृति विभाग के तत्वावधान में प्रदेश के 14 अंचलों में कला-साधना और सांस्कृतिक सौंदर्य का एक ऐसा अनुपम वितान तना, जिसने युवा पीढ़ी में नई सांस्कृतिक चेतना का संचार कर दिया। शासकीय संगीत एवं ललित कला महाविद्यालयों सहित विभिन्न सांस्कृतिक संस्थानों में आयोजित इन कार्यक्रमों का उद्देश्य नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, कला और परंपराओं से जोड़ना एवं उनमें सांस्कृतिक चेतना का संवर्धन करना रहा।</p>
<p style="text-align:justify">इसी श्रृंखला में, मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में आयोजित &#039;संगीत संध्या&#039; मुख्य आकर्षण रही, जहाँ कला-साधना और सांस्कृतिक सौंदर्य का अनूठा संगम देखने को मिला। इस शाम पुणे की सुप्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना सुस्मिता महाजन की लयात्मक प्रस्तुतियों और भोपाल की गुणी गायिका सुप्रदक्षिणा भट्ट के मनोहारी शास्त्रीय गायन ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया, जो सांस्कृतिक विरासत के संवर्धन में एक सराहनीय प्रयास सिद्ध हुआ। इस अवसर पर संचालक, संस्कृति एन.पी. नामदेव एवं संस्कृति संचालनालय की उप संचालक डॉ. पूजा शुक्ला ने उपस्थित कलाकारों का पुष्पगुच्छ भेंट कर आत्मीय स्वागत किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रोता एवं दर्शक उपस्थित रहे।</p>
<p style="text-align:justify">संगीत संध्या में पुणे (महाराष्ट्र) की सुप्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना सुस्मिता महाजन ने अपनी शिष्याओं सुहार्दिका फड़के, सुसिद्धि पाटिल एवं सुसिद्धि तार्डे के साथ भरतनाट्यम की प्रभावपूर्ण प्रस्तुति दी। प्रस्तुत सभी नृत्य रचनाएँ संस्कृत एवं हिंदी में रचित थीं, जिनका लेखन, संगीतबद्धता और नृत्य संयोजन स्वयं स्मिता महाजन द्वारा किया गया है। प्रस्तुति का शुभारंभ &lsquo;विनायक स्तुति&rsquo; से हुआ, जिसमें विघ्नहर्ता भगवान गणेश की वंदना करते हुए उनसे बुद्धि, शक्ति एवं मंगलकारी आशीर्वाद की कामना की गई। इसके पश्चात प्रस्तुत &lsquo;मल्लारी&rsquo; में मंदिरों में देवयात्रा के दौरान वाद्ययंत्रों पर बजाई जाने वाली पारंपरिक रचना को भरतनाट्यम की शैली में साकार किया गया। चार विभिन्न गतियों में प्रस्तुत इस रचना ने दर्शकों को लय और ताल की अद्भुत अनुभूति कराई।</p>
<p style="text-align:justify">अगली प्रस्तुति &lsquo;देवी कौतुकम्&rsquo; रही, जिसमें ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती, समृद्धि की प्रतीक देवी लक्ष्मी तथा शक्ति स्वरूपा माँ अम्बा की स्तुतियाँ तीन भिन्न रागों एवं तालों में प्रस्तुत की गईं। इसके बाद प्रस्तुत हिंदी पदम में एक युवती की मनःस्थिति को भावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त किया गया, जो अपनी प्रिय सखी के रूठ जाने से व्यथित है और उसे मनाने का उपाय खोज रही है। दूसरे पदम में वासकसज्जिता नायिका के भावों का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया, जिसमें वह अपने प्रियतम के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए उनके साथ बिताए जाने वाले सुखद क्षणों की कल्पना करती है। कार्यक्रम का समापन पारंपरिक रूप से &lsquo;तिल्लाना&rsquo; से हुआ, जो लयात्मकता, ऊर्जा और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत संगम था। राग देश में निबद्ध इस रचना के माध्यम से मातृभूमि को भावपूर्ण नमन अर्पित किया गया।</p>
<p style="text-align:justify">उल्लेखनीय है कि स्मिता महाजन ने स्वयं रचित एवं संगीतबद्ध 75 भरतनाट्यम रचनाओं का तीन खंडों में प्रकाशित ग्रंथ &lsquo;मार्गम उन्मेष&rsquo; तैयार किया है। उन्हें 16वीं से 19वीं शताब्दी के तंजावुर भोंसले राजाओं की परंपरा के पश्चात मराठी एवं हिंदी में नृत्य रचनाओं के लेखन और संगीत-सृजन की विशिष्ट परंपरा को आगे बढ़ाने वाली अग्रणी कलाकारों में माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify">भरतनाट्यम की प्रस्तुति पश्चात शास्त्रीय गायन की सभा सजी। भोपाल की गुणी गायिका सुप्रदक्षिणा भट्ट ने अपने सुरों से शाम को सजाया। उन्होंने अपनी सुरमयी प्रस्तुति की शुरुआत राग यमन कल्याण से किया। इस राग की गरिमा और माधुर्य को स्वर देते हुए एकताल में निबद्ध बड़ा ख़याल &ldquo;मेरा मन बाँध लीनो रे&rdquo; एवं तीनताल में छोटा ख़याल &ldquo;रंग दे रंग रेजवा&rdquo; प्रस्तुत किया। उनकी गायकी में राग की शास्त्रीय गंभीरता और भावों की सहज अभिव्यक्ति श्रोताओं को एक विशिष्ट संगीतानुभूति प्रदान कर रही थी। इसके उपरांत ग्वालियर घराने की समृद्ध और विशिष्ट परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हुए तराना एवं तिरबट की प्रस्तुति दी। तिरबट की विशेषता यह है कि इसमें अर्थपूर्ण शब्दों के स्थान पर तबले और पखावज के बोलों की प्रधानता रहती है, जो लय और स्वर के अद्भुत समन्वय का सृजन करती है। इस क्रम में उन्होंने हमीर, केदार, बहार, दरबारी, अड़ाना और भोपाली जैसी विविध रागों की रंगत प्रस्तुत की, जिन्हें एकताल, तीनताल एवं रूपक ताल में संयोजित किया गया। अपनी प्रस्तुति का भावपूर्ण समापन अपने दादा एवं गुरु पंडित सज्जनलाल ब्रह्मभट्ट द्वारा रचित भजन &ldquo;मोहन की राधा&rdquo; से किया, जो भक्ति, माधुर्य और गुरु-परंपरा के प्रति उनकी श्रद्धा का सुंदर प्रतीक था। इस संगीत संध्या में उनके साथ हारमोनियम पर चैतन्य भट्ट एवं तबले पर रतलाम के युवा तबला वादक तल्लीन त्रिवेदी ने संगत दी। स्वर, लय और भाव के समन्वय से सुसज्जित यह प्रस्तुति भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा, सौंदर्य और आध्यात्मिक संवेदना का अनुपम उत्सव सिद्ध हुई।</p>
<p style="text-align:justify">कार्यक्रम के दौरान उत्कृष्ट नृत्य एवं गायन प्रस्तुतियों ने वातावरण को कला-साधना और सांस्कृतिक सौंदर्य से सराबोर कर दिया। विश्व संगीत दिवस पर आयोजित यह संध्या भारतीय शास्त्रीय कलाओं की समृद्ध विरासत, सृजनात्मकता और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में एक सार्थक पहल सिद्ध हुई।</p>
<p style="text-align:justify">&nbsp;</p>
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		<title>संस्कृति विभाग ने अर्थाभावग्रस्त होनहार युवा कलाकारों के लिए छात्रवृत्ति योजना 2026-27 के तहत प्रविष्टियां की आमंत्रित</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Feb 2026 15:11:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[छत्तीसगढ़]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[Culture Department]]></category>
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					<description><![CDATA[रायपुर छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक एवं सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और प्रतिभाशाली युवाओं को प्रोत्साहन देने की दिशा में संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ ने अर्थाभावग्रस्त होनहार युवा कलाकारों एवं विद्यार्थियों के लिए वर्ष 2026-27 की छात्रवृत्ति योजना अंतर्गत प्रविष्टियां आमंत्रित की हैं। इस योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन प्रतिभाशाली युवाओं को कला के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:justify"><strong>रायपुर</strong></p>
<p style="text-align:justify">छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक एवं सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और प्रतिभाशाली युवाओं को प्रोत्साहन देने की दिशा में संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ ने अर्थाभावग्रस्त होनहार युवा कलाकारों एवं विद्यार्थियों के लिए वर्ष 2026-27 की छात्रवृत्ति योजना अंतर्गत प्रविष्टियां आमंत्रित की हैं। इस योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन प्रतिभाशाली युवाओं को कला के क्षेत्र में प्रशिक्षण एवं उच्च शिक्षा के लिए आवश्यक आर्थिक सहयोग प्रदान करना है। प्रविष्टियां निर्धारित प्रारूप में पूर्ण दस्तावेजों सहित पंजीकृत डाक के माध्यम से 20 मार्च 2026 तक आमंत्रित की गई हैं। राज्य सरकार का उद्देश्य है कि आर्थिक अभाव किसी भी प्रतिभाशाली युवा की प्रगति में बाधा न बने। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक एवं जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और संवर्धित करने की दिशा में यह छात्रवृत्ति योजना एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल न केवल युवा कलाकारों को आर्थिक संबल प्रदान करेगी, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में भी सहायक सिद्ध होगी।</p>
<p style="text-align:justify">विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार छात्रवृत्ति प्रोत्साहन हेतु विभिन्न विद्याएं एवं उपविद्याएं निर्धारित की गई हैं। लोक एवं पारंपरिक जनजातीय कलाओं के अंतर्गत छत्तीसगढ़ की समस्त पारंपरिक जनजातीय एवं लोक नृत्य, नृत्य-गीत, लोकसंगीत, पारंपरिक खेल, वाद्य, पंडवानी, ददरिया, करमा, सुवा, राउत नाचा, गोंडी सहित अन्य जनजातीय गायन-वादन एवं लोक परंपराएं सम्मिलित हैं। शास्त्रीय संगीत में हिंदुस्तानी एवं कर्नाटक (गायन/वादन) मान्य हैं। शास्त्रीय नृत्य में भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, मणिपुरी, कथकली आदि विधाएं शामिल हैं। रंगमंच के अंतर्गत हिंदी एवं छत्तीसगढ़ी नाटक तथा अन्य लोक-जनजातीय नाट्य विधाएं सम्मिलित की गई हैं। दृश्य कला में ग्राफिक्स, मूर्तिकला, पेंटिंग, फोटोग्राफी, मृद्भांड (सेरामिक्स) एवं लोक-जनजातीय चित्रांकन परंपराएं शामिल हैं। इसके अतिरिक्त सुगम शास्त्रीय संगीत की विधाएं जैसे ठुमरी, दादरा, टप्पा, भजन, ग़ज़ल एवं कव्वाली भी मान्य हैं।</p>
<p style="text-align:justify">योजना के लिए पात्रता एवं सामान्य शर्तें भी निर्धारित की गई हैं। आवेदक छत्तीसगढ़ का मूल निवासी होना चाहिए तथा चिन्हारी पोर्टल में पंजीयन अनिवार्य है। आवेदक की आयु 15 वर्ष से कम और 30 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। आवेदक अथवा उसके माता-पिता/अभिभावक की वार्षिक आय 72,000 रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए। आवेदन केवल निर्धारित प्रारूप में ही स्वीकार किए जाएंगे। चयनित विद्यार्थियों को नियमानुसार मासिक छात्रवृत्ति प्रोत्साहन राशि 5,000 रुपये से 10,000 रुपये तक प्रदान की जाएगी, जो डीबीटी/ई-पेमेंट के माध्यम से सीधे खाते में अंतरित होगी। आवेदन स्वीकार करने की अंतिम तिथि 20 मार्च 2026 निर्धारित की गई है। लिफाफे पर स्पष्ट रूप से &ldquo;अर्थाभावग्रस्त होनहार युवा कलाकारों/छात्रों के लिए छात्रवृत्ति योजना 2026-27&rdquo; अंकित करना अनिवार्य होगा। विलंब से प्राप्त अथवा अपूर्ण आवेदन पर विचार नहीं किया जाएगा। योजना से संबंधित विस्तृत जानकारी विभागीय वेबसाइटwww.cgculture.inपर उपलब्ध है।</p>
<p style="text-align:justify">राज्य सरकार का मानना है कि कला केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की आत्मा है। लोक और जनजातीय परंपराओं से समृद्ध छत्तीसगढ़ में युवाओं को प्रोत्साहन देना सांस्कृतिक संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। कला केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की आत्मा है। छत्तीसगढ़ की लोक परंपराएं, जनजातीय संस्कृति, लोकनृत्य, पंथी, राउत नाचा, भरथरी, करमा जैसे लोक रूप प्रदेश की पहचान हैं। ऐसे में युवा कलाकारों को प्रोत्साहन देना सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस योजना के माध्यम से न केवल कलाकारों को आर्थिक संबल मिलेगा, बल्कि प्रदेश में सांस्कृतिक गतिविधियों को भी नया आयाम प्राप्त होगा। राज्य सरकार की यह पहल &lsquo;सबका साथ, सबका विकास&rsquo; की भावना को साकार करते हुए यह संदेश देती है कि प्रतिभा किसी संसाधन की मोहताज नहीं होती अपितु उसे केवल अवसर और प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा लगातार कला, संस्कृति और युवाओं के सशक्तिकरण के लिए किए जा रहे प्रयासों की कड़ी में यह छात्रवृत्ति योजना एक और महत्वपूर्ण कदम है, जो प्रदेश को सांस्कृतिक रूप से और अधिक समृद्ध एवं सशक्त बनाने में सहायक सिद्ध होगी। यह छात्रवृत्ति योजना आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाओं को संबल प्रदान करते हुए प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को सशक्त और समृद्ध बनाने में मील का पत्थर साबित होगी।</p>
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