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	<title>High Court &#8211; NewsX 24</title>
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	<title>High Court &#8211; NewsX 24</title>
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		<title>सरकारी संपत्ति की सुरक्षा में लापरवाही पर हाईकोर्ट सख्त, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Jun 2026 04:22:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मध्य प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[High Court]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;जबलपुर &#160;हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने सरकारी संपत्ति की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी संपत्ति की रक्षा करना सरकार और उसके अधिकारियों का संवैधानिक दायित्व है। इसमें किसी भी तरह की लापरवाही जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात मानी जाएगी। अदालत ने &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>&nbsp;जबलपुर</strong><br />
&nbsp;हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने सरकारी संपत्ति की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी संपत्ति की रक्षा करना सरकार और उसके अधिकारियों का संवैधानिक दायित्व है। इसमें किसी भी तरह की लापरवाही जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात मानी जाएगी।</p>
<p>अदालत ने कहा कि सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा में नाकाम रहने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की जानी चाहिए। इसके साथ ही आवश्यकता पड़ने पर ऐसे अधिकारियों के खिलाफ एफआइआर भी दर्ज की जा सकती है।</p>
<p><strong>वर्षों तक फाइल दबाए रखने वालों को संदेश</strong><br />
हाई कोर्ट का यह आदेश सरकारी जमीन से जुड़े मामलों में लंबे समय तक कार्रवाई नहीं करने वाले अधिकारियों के लिए सख्त संदेश माना जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि यदि अधिकारियों की लापरवाही के कारण सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचता है तो केवल सरकारी खजाने पर इसका भार नहीं डाला जा सकता। ऐसी स्थिति में जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। कोर्ट ने प्रशासनिक निष्क्रियता को केवल सामान्य चूक नहीं माना, बल्कि इसे जनता की संपत्ति की सुरक्षा के संवैधानिक दायित्व की अनदेखी बताया।</p>
<p><strong>बैतूल की 5.5 हेक्टेयर सरकारी जमीन का मामला</strong><br />
यह मामला बैतूल जिले के सूरगांव स्थित करीब 5.5 हेक्टेयर सरकारी भूमि के विवाद से जुड़ा है। इस मामले में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जो वर्ष 2004 के निर्णय के खिलाफ लगभग 12 साल बाद दायर की गई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारियों को मामले की पूरी जानकारी थी, इसके बावजूद उन्होंने समय रहते आवश्यक कानूनी कदम नहीं उठाए। अदालत ने इसे गंभीर लापरवाही माना।</p>
<p><strong>सार्वजनिक संसाधनों की सरकार ट्रस्टी</strong><br />
अपने आदेश में हाई कोर्ट ने पब्लिक ट्रस्ट डाक्ट्रिन का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार सार्वजनिक संसाधनों की मालिक नहीं, बल्कि उनकी ट्रस्टी होती है। इसलिए सरकारी जमीन को निजी हाथों में जाने से रोकना अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण में विफल रहने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही दोबारा न हो।</p>
<p><strong>कलेक्टर से पटवारी तक जांच की अनुमति</strong><br />
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को तत्कालीन कलेक्टर, अतिरिक्त कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर, तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और पटवारियों के विरुद्ध विभागीय जांच शुरू करने की स्वतंत्रता दी है।</p>
<p>इसके अलावा कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जांच में जिम्मेदारी तय होती है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की कार्रवाई भी की जा सकती है।</p>
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		<title>MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पेंशन बढ़ोतरी, एरियर और अतिरिक्त इंक्रीमेंट की मांग खारिज</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Jun 2026 14:12:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मध्य प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[High Court]]></category>
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					<description><![CDATA[जबलपुर &#160;हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने वेतन पुनरीक्षण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वेतन पुनरीक्षण के समय कर्मचारियों द्वारा चुना गया विकल्प बाद में बदला नहीं जा सकता। कोर्ट ने अतिरिक्त वेतनवृद्धि के आधार पर पेंशन &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जबलपुर</strong><br />
&nbsp;हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने वेतन पुनरीक्षण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वेतन पुनरीक्षण के समय कर्मचारियों द्वारा चुना गया विकल्प बाद में बदला नहीं जा सकता।</p>
<p>कोर्ट ने अतिरिक्त वेतनवृद्धि के आधार पर पेंशन और एरियर बढ़ाने की मांग को खारिज करते हुए कहा कि स्वेच्छा से संशोधित वेतनमान स्वीकार करने वाला कर्मचारी बाद में पुरानी वेतन व्यवस्था का लाभ नहीं मांग सकता।</p>
<p><strong>पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका निरस्त</strong><br />
मामले में पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से याचिका दायर की गई थी। याचिका में अतिरिक्त इंक्रीमेंट को आधार बनाकर पेंशन के पुनर्निर्धारण और एरियर भुगतान की मांग की गई थी। हाई कोर्ट ने सुनवाई के बाद याचिका को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश वेतन पुनरीक्षण नियम, 2009 के नियम-नौ में कर्मचारियों को दो स्पष्ट विकल्प दिए गए हैं।</p>
<p><strong>संशोधित वेतनमान स्वीकार करने के बाद पुरानी व्यवस्था का लाभ नहीं</strong><br />
युगलपीठ ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने एक जनवरी, 2006 से संशोधित वेतनमान लागू करने का विकल्प चुना है तो वह बाद में पुरानी वेतन व्यवस्था में अतिरिक्त इंक्रीमेंट जोड़कर पेंशन पुनर्निर्धारण की मांग नहीं कर सकता।</p>
<p>कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि नियम कर्मचारियों को स्वतंत्र रूप से विकल्प चुनने का अधिकार देते हैं, लेकिन विकल्प चुनने के बाद उसके परिणामों से पीछे हटने की अनुमति नहीं दी जा सकती।</p>
<p><strong>नियम-नौ को कोर्ट ने माना वैध</strong><br />
हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश वेतन पुनरीक्षण नियम, 2009 के नियम-नौ को वैध ठहराते हुए कहा कि कर्मचारी एक साथ दो वित्तीय लाभ का दावा नहीं कर सकते। इसी आधार पर कोर्ट ने पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका को खारिज कर दिया।</p>
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		<title>धर्म परिवर्तन के बाद OBC आरक्षण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, इस्लाम अपनाने पर नहीं मिलेगा पिछड़ा वर्ग का लाभ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 27 Jun 2026 03:35:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>
		<category><![CDATA[High Court]]></category>
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					<description><![CDATA[चेन्नई मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में धर्म परिवर्तन और आरक्षण को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है, जिसके तहत हिंदू धर्म की पिछड़ी, अति-पिछड़ी या अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को &#039;बैकवर्ड क्लास मुस्लिम&#039; का &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>चेन्नई</strong></p>
<p>मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में धर्म परिवर्तन और आरक्षण को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है, जिसके तहत हिंदू धर्म की पिछड़ी, अति-पिछड़ी या अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को &#039;बैकवर्ड क्लास मुस्लिम&#039; का दर्जा और आरक्षण देने की बात कही गई थी।</p>
<p>जस्टिस जी आर स्वामीनाथन और जस्टिस पी बी बालाजी की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी व्यक्ति इस्लाम अपनाने के बाद सिर्फ एक मुस्लिम होता है। पीठ ने कहा, &ldquo;कोई भी शख्स इस्लाम अपनाने के बाद सिर्फ &#039;एक मुसलमान&#039; रह जाता है, बस बात यहीं खत्म। वह बैकवर्ड क्लास मुस्लिम के दर्जे या आरक्षण का दावा कतई नहीं कर सकता।&quot;</p>
<p><strong>क्या था मामला?</strong><br />
यह मामला थूथुकुडी जिले के रहने वाले समीर अहमद की याचिका के बाद सामने आया। पहले उसका नाम परमशिवम था। परमशिवम का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था। 2015 में उसने इस्लाम धर्म अपनाकर अपना नाम समीर अहमद रख लिया और मुस्लिम रीति-रिवाजों से शादी की। धर्म परिवर्तन के बाद समीर ने तहसीलदार के पास &#039;मुस्लिम लेब्बाई&#039; जाति का कम्युनिटी सर्टिफिकेट पाने के लिए आवेदन किया। इस जाति को तमिलनाडु में &#039;पिछड़े वर्ग के मुसलमानों&#039; का दर्जा प्राप्त है।</p>
<p>तहसीलदार ने समीर का आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद समीर ने हाईकोर्ट का रुख किया और तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें कनवर्टेड मुस्लिमों को आरक्षण देने की बात कही गई थी। तमिलनाडु सरकार ने दलील दी कि कनवर्ट होने वाले व्यक्ति को आरक्षण इसीलिए दिया जा रहा है ताकि वह अपनी पुरानी आरक्षित श्रेणी का लाभ उठा सके। हालांकि हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की दलील को खारिज कर दिया।</p>
<p><strong>क्या बोला मद्रास हाईकोर्ट?</strong><br />
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हालांकि मुस्लिम समाज में भी कई ऐसे समुदाय मौजूद हैं, लेकिन इन समुदायों की सदस्यता केवल जन्म से तय होती है। बेंच ने कहा, &ldquo;बेझिझक यह कहा जा सकता है कि वे हिंदू धर्म की जातियों के समान हैं। जैसे जाति जन्म से तय होती है, वैसे ही कोई व्यक्ति जन्म से ही राउथर, मरक्कयार या दक्कनी मुस्लिम होता है। यह कहना बेतुका है कि किसी को राउथर मुस्लिम में बदला जा सकता है।&rdquo;</p>
<p>मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के इस सरकारी आदेश को संविधान और इस्लाम दोनों के सिद्धांतों के खिलाफ बताया। बेंच ने साल 1951 के &#039;जी माइकल बनाम एस वेंकटेश्वरन&#039; मामले का हवाला दिया, जिसमें साफ कहा गया था कि जब कोई हिंदू इस्लाम अपनाता है, तो वह &#039;सिर्फ एक मुसलमान&#039; बनता है और मुस्लिम समाज में उसका स्थान उसकी पिछली जाति से तय नहीं होता।</p>
<p><strong>सिर्फ आरक्षण के लिए नहीं दे सकते लाभ</strong><br />
अदालत ने कहा, &quot;ईसाई मिशनरियों और इस्लामिक उपदेशकों ने दशकों और सदियों तक यह प्रचार किया कि उनके धर्मों में सामाजिक समानता है, जबकि हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था है। धर्म-परिवर्तन के लिए ऐसा रुख अपनाने के बाद, अब यह दावा करना गलत है कि इस्लाम में भी ऊंच-नीच है। हमारी राय में, कुछ समुदायों को &#039;पिछड़ा&#039; और बाकी को &#039;अगड़ा&#039; मानना ​​कुरान की शिक्षाओं के खिलाफ है। इस्लाम एक ऐसा समाज बनाना चाहता है जिसमें सब बराबर हों। अल्लाह की नजर में सब समान हैं। वहां कोई सामाजिक ऊंच-नीच नहीं है।&quot; अदालत ने कहा कि राज्य सरकार सिर्फ इसलिए विभिन्न जातियों के कनवर्टेड मुस्लिमों का एक समूह बनाकर उन्हें आरक्षण नहीं दे सकती कि वे लाभ उठाते रहें।</p>
]]></content:encoded>
					
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		<item>
		<title>परियोजना खत्म तो नौकरी भी समाप्त: संविदा वैज्ञानिक की सेवा बहाली से हाई कोर्ट का इनकार</title>
		<link>https://newsx24.com/no-job-once-the-project-ends-high-court-refuses-to-reinstate-contractual-scientist/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 26 Jun 2026 12:02:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पंजाब]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[High Court]]></category>
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					<description><![CDATA[चंडीगढ़ पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब स्टेट काउंसिल फार साइंस एंड टेक्नोलॉजी में कार्यरत संविदा वैज्ञानिक दिव्या कौशिक को राहत देने से इनकार करते हुए उनकी&#160; अपील&#160; &#160;खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस परियोजना के लिए उनकी नियुक्ति की गई थी, वह 31 मार्च 2026 को समाप्त हो चुकी है &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>चंडीगढ़</strong><br />
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब स्टेट काउंसिल फार साइंस एंड टेक्नोलॉजी में कार्यरत संविदा वैज्ञानिक दिव्या कौशिक को राहत देने से इनकार करते हुए उनकी&nbsp; अपील&nbsp; &nbsp;खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस परियोजना के लिए उनकी नियुक्ति की गई थी, वह 31 मार्च 2026 को समाप्त हो चुकी है और ऐसी स्थिति में संविदा सेवा को जारी रखने का कोई आधार नहीं बनता।</p>
<p>जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी और जस्टिस अमरजोत भट्टी की खंडपीठ ने यह फैसला उस अपील पर सुनाया, जिसमें एकल पीठ द्वारा पारित 23 मार्च और 6 अप्रैल 2026 के अंतरिम आदेशों को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि मूल&nbsp; याचिका अभी भी एकल पीठ के <strong>समक्ष लंबित है और अपील केवल अंतरिम आदेशों के खिलाफ दायर की गई है, इसलिए हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं है।</strong></p>
<p><strong>2011 में जॉइन की थी सेवा</strong><br />
याचिकाकर्ता दिव्या कौशिक की ओर से कहा गया कि उन्हें वर्ष 2011 में पेटेंट इनफार्मेशन सेंटर (पीआईसी) में वैज्ञानिक के पद पर संविदा आधार पर नियुक्त किया गया था और समय-समय पर उनका कार्यकाल बढ़ाया जाता रहा। उन्होंने&nbsp; याचिका में उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनके पद को समाप्त कर दिया गया था। एकल पीठ ने 16 जुलाई 2024 को यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।</p>
<p>हालांकि बाद में परिषद की ओर से दायर आवेदन पर एकल पीठ ने 23 मार्च 2026 को आदेश में संशोधन करते हुए कहा था कि यदि परियोजना 31 मार्च 2026 के बाद भी बढ़ाई जाती है तो यथास्थिति का आदेश जारी रहेगा, अन्यथा परिषद उस आदेश से बाध्य नहीं होगी। इस आदेश को वापस लेने की मांग भी 6 अप्रैल 2026 को खारिज कर दी गई थी।</p>
<p><strong>5 वर्षों के लिए थी परियोजना<br />
सुनवाई के दौरान परिषद की ओर </strong>से अदालत को बताया गया कि &#039;पेटेंट इनफार्मेशन सेंटर&#039; परियोजना पांच वर्ष की अवधि के लिए थी और यह 31 मार्च 2026 को पूरी हो चुकी है। इसलिए परियोजना के साथ सह-समाप्त (को-टर्मिनस) संविदा नियुक्ति भी स्वत&nbsp; समाप्त हो गई। परिषद ने यह भी बताया कि नियुक्ति पत्र में स्पष्ट शर्त थी कि परियोजना की अवधि समाप्त होने पर अनुबंध समाप्त माना जाएगा।</p>
<p>खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ द्वारा पारित आदेश न तो अवैध हैं और न ही उनमें किसी प्रकार की त्रुटि है। चूंकि परियोजना का विस्तार नहीं हुआ और वह पूर्ण हो चुकी है, इसलिए संविदा कर्मचारी की सेवा जारी रखने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता। इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने अपील खारिज कर दी</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>14 लाख सालाना कमाने वाली पत्नी को नहीं मिलेगा मेंटिनेंस, हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला</title>
		<link>https://newsx24.com/wife-earning-%e2%82%b914-lakh-annually-not-entitled-to-maintenance-high-court-delivers-major-verdict/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 04:42:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मध्य प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[High Court]]></category>
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					<description><![CDATA[भोपाल&#160; भोपाल की रहने वाली एक महिला की ओर से पति से अंतरिम भरण-पोषण (मेंटिनेंस) की मांग को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक &#8216;मर्चेंट ऑफ वेनिस&#8217; का जिक्र करते हुए &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>भोपाल&nbsp;</strong></p>
<p>भोपाल की रहने वाली एक महिला की ओर से पति से अंतरिम भरण-पोषण (मेंटिनेंस) की मांग को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता।</p>
<p>सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक &lsquo;मर्चेंट ऑफ वेनिस&rsquo; का जिक्र करते हुए टिप्पणी की कि यह मांग पति से &ldquo;एक पाउंड मांस&rdquo; वसूलने के प्रयास जैसी प्रतीत होती है, जिसकी अनुमति न्यायालय नहीं दे सकता।</p>
<p>मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक जैन की एकल पीठ ने की। महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें तलाक संबंधी लंबित प्रकरण के दौरान अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग को अस्वीकार कर दिया गया था।</p>
<p><strong>2022 में हुई थी शादी, 2023 से अलग रह रहे</strong><br />
दंपति का विवाह 4 नवंबर 2022 को हुआ था। 2023 से दोनों अलग रह रहे हैं। पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी, जबकि पत्नी ने अंतरिम भरण-पोषण की मांग की थी।</p>
<p>फैमिली कोर्ट ने 18 फरवरी 2026 को आदेश दिया था कि तलाक प्रकरण लंबित रहने के दौरान महिला को कोई मेंटिनेंस नहीं दिया जाएगा। इसी आदेश को महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।</p>
<p><strong>पहले 20 लाख, अब 14 लाख सालाना आय का दावा</strong><br />
महिला ने अदालत में स्वीकार किया कि वह नौकरी करती हैं। पहले उनकी वार्षिक आय लगभग 20 लाख रुपए थी, जबकि पति की आय 30 लाख रुपए से ज्यादा बताई गई थी। बाद में महिला ने कहा कि उनकी आय घटकर करीब 14 लाख रुपए सालाना रह गई है, इसलिए उन्हें आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए।</p>
<p><strong>हाईकोर्ट ने वेतन रिकॉर्ड देखे</strong><br />
हाईकोर्ट ने महिला की आय से जुड़े दस्तावेजों की जांच की। रिकॉर्ड के अनुसार महिला की मासिक आय लगभग 1.25 लाख रुपए है, जिससे उनकी वार्षिक आय करीब 14.81 लाख रुपए बनती है।</p>
<p>अदालत ने कहा कि यह आय स्वयं का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त है। ऐसे में महिला को आर्थिक रूप से आश्रित नहीं माना जा सकता।</p>
<p><strong>कोई संतान नहीं, आय में भी बड़ा अंतर नहीं</strong><br />
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि दंपति की कोई संतान नहीं है। साथ ही पति और पत्नी की आय में इतना बड़ा अंतर भी नहीं है कि आर्थिक निर्भरता का आधार बनाया जा सके।</p>
<p>अदालत ने कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य आर्थिक रूप से जरूरतमंद या आश्रित जीवनसाथी की सहायता करना है, न कि समान आर्थिक स्थिति वाले व्यक्ति को अतिरिक्त वित्तीय लाभ देना।</p>
<p><strong>फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार</strong><br />
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट के आदेश को यथावत रखा।</p>
<p>अदालत ने अपने फैसले में दोहराया कि मेंटिनेंस का प्रावधान आर्थिक रूप से कमजोर जीवनसाथी की मदद के लिए है। यदि कोई व्यक्ति स्वयं पर्याप्त आय अर्जित कर रहा है और अपना खर्च उठाने में सक्षम है, तो उसे भरण-पोषण का लाभ नहीं दिया जा सकता।</p>
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
					
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			</item>
		<item>
		<title>MP शिक्षक भर्ती मामले में बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने चॉइस फिलिंग की दी अनुमति; नियुक्ति आदेश पर रोक</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 24 Jun 2026 09:22:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मध्य प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[High Court]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने शिक्षक भर्ती प्रक्रिया से जुड़े एक मामले में याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए चॉइस फिलिंग की अनुमति दे दी है। साथ ही स्पष्ट किया है कि उनके नियुक्ति आदेश फिलहाल जारी नहीं किए जाएंगे और यह प्रक्रिया याचिका के अंतिम निर्णय &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>&nbsp;जबलपुर</strong><br />
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने शिक्षक भर्ती प्रक्रिया से जुड़े एक मामले में याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए चॉइस फिलिंग की अनुमति दे दी है। साथ ही स्पष्ट किया है कि उनके नियुक्ति आदेश फिलहाल जारी नहीं किए जाएंगे और यह प्रक्रिया याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी। यह मामला डेढ़ हजार से अधिक अभ्यर्थियों से जुड़ा है।</p>
<p>कोर्ट के समक्ष भोपाल निवासी प्रिया देव सहित अन्य बनाम मध्य प्रदेश शासन व अन्य प्रकरण की सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रवीण कुमार वर्मा व डॉ. ज्योति वर्मा ने पक्ष रखा।</p>
<p>उन्होंने दलील दी कि सभी याचिकाकर्ता एक जैसी शर्तों और विवाद से प्रभावित हैं, इसलिए अलग-अलग याचिकाएं दायर करना व्यावहारिक नहीं होगा। इस पर कोर्ट ने संयुक्त याचिका दायर करने संबंधी आवेदन स्वीकार कर लिया।</p>
<p><strong>चॉइस फिलिंग में भाग लेने की अनुमति दी</strong><br />
अधिवक्ता वर्मा ने यह भी तर्क दिया कि इसी प्रकार के मामले डब्ल्यूपी क्रमांक 21474/2026 में हाई कोर्ट द्वारा 19 जून, 2026 को अंतरिम राहत प्रदान की जा चुकी है। तर्कों से सहमत होते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को चॉइस फिलिंग में भाग लेने की अनुमति दे दी, लेकिन नियुक्ति आदेश जारी करने पर रोक लगा दी।</p>
<p>राज्य शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता प्रवीण नामदेव उपस्थित रहे। कोर्ट ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। मामले को चार सप्ताह बाद संबंधित याचिका के साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>सतलुज नदी से गाद निकालने को हाई कोर्ट की मंजूरी, फैसले के बाद संघर्ष समिति ने उठाए सवाल</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 19 Jun 2026 12:42:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पंजाब]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[High Court]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;रूपनगर &#160;सतलुज नदी पर स्थित अगमपुर पुल के निकट डी-सिल्टिंग मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के ताजा आदेशों को लागू करने से पहले विभाग को मौके की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए व कानून और निर्धारित मानकों के अनुरूप ही कार्य किया जाना चाहिए। जिससे आगामी बरसाती मौसम में लोगों को किसी प्रकार की &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>&nbsp;रूपनगर</strong><br />
&nbsp;सतलुज नदी पर स्थित अगमपुर पुल के निकट डी-सिल्टिंग मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के ताजा आदेशों को लागू करने से पहले विभाग को मौके की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए व कानून और निर्धारित मानकों के अनुरूप ही कार्य किया जाना चाहिए। जिससे आगामी बरसाती मौसम में लोगों को किसी प्रकार की परेशानी या नुकसान का सामना न करना पड़े।</p>
<p>ये मांग संघर्ष समिति के सदस्यों ने करते हुए कहा कि प्रशासन पहले इस क्षेत्र का सीमांकन कर उसे पूरी तरह स्पष्ट करे और तारबंदी करने के बाद ही डी-सिल्टिंग का कार्य शुरू किया जाए।</p>
<p>जिससे कि भविष्य में किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो। संघर्ष समिति ने यह भी सवाल उठाया कि सतलुज नदी का पानी पुल के पिल्लर नंबर-1 की ओर ही अधिक दबाव के साथ क्यों बह रहा है।</p>
<p>क्या इसका कारण पुल के ऊपरी क्षेत्र में पूर्व में हुए अवैध खनन के कारण नदी की प्राकृतिक धारा का बदल जाना है। यदि ऐसा है तो विभाग इस तथ्य को सार्वजनिक करने से क्यों बच रहा है।</p>
<p><strong>30 जून को दी गई थी डी-सिल्टिंग की अनुमति</strong><br />
सदस्यों ने करते हुए कहा कि 8 जून को दिए गए अंतरिम स्थगन आदेश में संशोधन करते हुए हाईकोर्ट ने पुल के पिलर नंबर-1 की मरम्मत व पुल से 35 से 50 मीटर अपस्ट्रीम तक सीमित क्षेत्र में 30 जून 2026 तक डी-सिल्टिंग की अनुमति दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि 30 जून के बाद न्यायालय की अनुमति के बिना किसी प्रकार की डी-सिल्टिंग नहीं की जाएगी।</p>
<p>इसके साथ ही रूपनगर के उपायुक्त को स्वयं मौके पर निगरानी रखने, अवैध खनन पर रोक सुनिश्चित करने व अगली सुनवाई से पहले स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।</p>
<p>अदालती आदेश के बाद संघर्ष समिति ने कहा कि जनहित को ध्यान में रखते हुए सरकार और संबंधित विभागों को कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब सार्वजनिक करने चाहिए।</p>
<p>संघर्ष समिति के अध्यक्ष हरदेव सिंह माजरी टिब्बा, यशवीर चंद भलाण, पंजाब मोर्चा के संयोजक गौरव राणा, एडवोकेट विशाल सैनी, सुरजीत सिंह ढेर, बलवीर सिंह शाहपुर, कीर्ति किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष वीर सिंह बड़वा, संयुक्त किसान मोर्चा के नेता धर्मपाल सैनी माजरा व निहंग जत्थेबंदियों के प्रमुख बाबा अच्छर सिंह महाकाल ने संयुक्त रूप से कहा कि विभाग द्वारा अदालत के समक्ष नए खसरा नंबर प्रस्तुत किए गए हैं। ऐसे में सबसे पहले यह स्पष्ट किया जाए कि पुल से 35 से 50 मीटर तक डी-सिल्टिंग का वास्तविक क्षेत्र कौन-सा है।</p>
<p><strong>2020 की पीडब्ल्यूडी विभाग की रिपोर्ट पर सरकार ने क्या कार्रवाई की</strong><br />
पंजाब मोर्चा के संयोजक गौरव राणा ने वर्ष 2020 में लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) द्वारा जारी पत्र का हवाला देते हुए कहा कि उस समय स्वयं विभाग ने स्वीकार किया था कि अवैध खनन के कारण पुल के पिलर 20 से 25 फीट तक उजागर हो चुके थे और पुल की सुरक्षा के लिए एक विशेष समिति गठित करने की सिफारिश की गई थी।</p>
<p>उन्होंने सवाल उठाया कि उस रिपोर्ट के बाद सरकार ने क्या कार्रवाई की, समिति का गठन हुआ या नहीं और पिछले छह वर्षों में पुल की सुरक्षा के लिए कौन-कौन से कदम उठाए गए।</p>
<p>उन्होंने मांग की कि यदि वर्ष 2020 में पिल्लर 20 से 25 फीट तक उजागर हो चुके थे तो वर्ष 2026 में उनकी वर्तमान स्थिति क्या है, इसकी तकनीकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। साथ ही पुल की वर्तमान स्थिति, नदी की जलधारा की दिशा तथा डी-सिल्टिंग के संभावित प्रभावों की पूरी जानकारी भी जनता के सामने रखी जाए।</p>
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मालिकाना हक नहीं तो रजिस्ट्री अमान्य; टैक्स भरने से नहीं मिलेगा स्वामित्व</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 19 Jun 2026 05:12:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मध्य प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[High Court]]></category>
		<category><![CDATA[top-news]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;ग्वालियर जमीन खरीदने से पहले केवल रजिस्ट्री, नामांतरण और प्रॉपर्टी टैक्स के दस्तावेज देखकर संतुष्ट हो जाना भारी पड़ सकता है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि जमीन बेचने वाले के पास वैध मालिकाना हक नहीं था, तो उसके द्वारा किया गया पूरा सौदा अवैध माना जाएगा। अदालत ने &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>&nbsp;ग्वालियर</strong><br />
जमीन खरीदने से पहले केवल रजिस्ट्री, नामांतरण और प्रॉपर्टी टैक्स के दस्तावेज देखकर संतुष्ट हो जाना भारी पड़ सकता है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि जमीन बेचने वाले के पास वैध मालिकाना हक नहीं था, तो उसके द्वारा किया गया पूरा सौदा अवैध माना जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि नगर पालिका में नाम दर्ज होने या टैक्स जमा करने मात्र से किसी व्यक्ति का स्वामित्व सिद्ध नहीं होता।</p>
<p>यह टिप्पणी अशोकनगर के लंबरदार मोहल्ले स्थित धनुषधारी बांके देव मंदिर की करीब 98 बीघा भूमि से जुड़े विवाद की सुनवाई के दौरान की गई। राजस्व अभिलेखों में यह जमीन मंदिर के नाम दर्ज है, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 50 करोड़ रुपये बताई गई है। आरोप है कि मंदिर के पुजारी मोहनदास के पुत्र कमलदास ने स्वयं को जमीन का मालिक बताकर इसके प्लॉट काटकर कई लोगों को बेच दिए। खरीदारों ने रजिस्ट्री कराई, नगर पालिका में नामांतरण कराया, मकान बनाए और वर्षों तक प्रॉपर्टी टैक्स भी जमा किया।</p>
<p>खंडपीठ ने खरीदारों की याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि मंदिर का पुजारी या महंत संपत्ति का मालिक नहीं, बल्कि केवल उसका प्रबंधक होता है। इसलिए उसके पास संपत्ति बेचने का अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस व्यक्ति के पास वैध स्वामित्व नहीं है, वह जमीन का हस्तांतरण नहीं कर सकता। ऐसे में खरीदारों को भी मालिकाना अधिकार नहीं मिलेगा और उन्हें अतिक्रमणकारी माना जाएगा। कोर्ट ने दोहराया कि रजिस्ट्री, नामांतरण और प्रॉपर्टी टैक्स जैसे दस्तावेज स्वामित्व का अंतिम प्रमाण नहीं हैं, बल्कि मूल मालिकाना हक की जांच सबसे महत्वपूर्ण है।</p>
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
					
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		<item>
		<title>हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: दूसरी पत्नी को फैमिली पेंशन से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 Jun 2026 05:11:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पंजाब]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[High Court]]></category>
		<category><![CDATA[top-news]]></category>
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					<description><![CDATA[चंडीगढ़ पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मृत सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी को पूरी पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। यह तब लागू होगा जब वह एकमात्र जीवित और पात्र दावेदार हो। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल दूसरी पत्नी होने के आधार &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>चंडीगढ़</strong><br />
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मृत सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी को पूरी पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। यह तब लागू होगा जब वह एकमात्र जीवित और पात्र दावेदार हो। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल दूसरी पत्नी होने के आधार पर विधवा को 50 फीसदी पेंशन तक सीमित करना नियमों की गलत व्याख्या है। जस्टिस नमित कुमार ने गुरदासपुर निवासी एक महिला की याचिका स्वीकार की। उन्होंने 25 मई 2022 के उस आदेश को रद्द किया जिसमें महिला को 50 फीसदी पेंशन का हकदार माना गया था। अदालत ने संबंधित विभाग को महिला को पूर्ण पारिवारिक पेंशन जारी करने का निर्देश दिया। साथ ही बकाया राशि ब्याज सहित देने का भी आदेश दिया गया।</p>
<p>याचिकाकर्ता के पति पंजाब सरकार में जिला कोषागार अधिकारी थे। उनका निधन 14 नवंबर 2011 को हुआ था। पहली पत्नी का निधन 6 नवंबर 1980 को हो चुका था। याचिकाकर्ता से विवाह 30 मई 1992 को हुआ था।</p>
<p><strong>पेंशन स्वीकृति में त्रुटि&nbsp;</strong><br />
पति की मृत्यु के बाद महालेखाकार कार्यालय ने 3 अगस्त 2015 को पेंशन भुगतान आदेश जारी किया। इस आदेश में याचिकाकर्ता को केवल 50 फीसदी पारिवारिक पेंशन स्वीकृत की गई थी। इसके पीछे तर्क दिया गया कि वह मृत कर्मचारी की दूसरी पत्नी हैं। हाईकोर्ट ने पाया कि कर्मचारी की मृत्यु के समय याचिकाकर्ता ही एकमात्र जीवित पत्नी थीं।</p>
<p><strong>हाईकोर्ट का तर्क</strong><br />
अदालत ने कहा कि एक से अधिक जीवित विधवाओं के बीच पेंशन बंटवारे का नियम यहां लागू नहीं होता। विभाग की गलत व्याख्या से पेंशन का एक हिस्सा बिना लाभार्थी के अटका रह जाता। यह पारिवारिक पेंशन योजना की मूल भावना के विपरीत है। हाईकोर्ट ने दोहराया कि एकमात्र पात्र दावेदार होने पर दूसरी पत्नी को पूर्ण पेंशन मिलेगी।&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
					
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			</item>
		<item>
		<title>7299 रुपये के टीए बिल पर 19 साल चली लड़ाई, हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की अपील खारिज की</title>
		<link>https://newsx24.com/19-year-legal-battle-over-%e2%82%b97299-ta-bill-high-court-dismisses-haryana-governments-appeal/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 06 Jun 2026 15:12:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[हरियाणा]]></category>
		<category><![CDATA[High Court]]></category>
		<category><![CDATA[top-news]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;चंडीगढ महज 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता (टीए) बिल को लेकर शुरू हुआ विवाद 19 वर्ष तक अदालतों में चलता रहा, लेकिन आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की नियमित द्वितीय अपील को खारिज करते हुए इस लंबे कानूनी विवाद पर विराम लगा दिया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मूल &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>&nbsp;चंडीगढ</strong><br />
महज 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता (टीए) बिल को लेकर शुरू हुआ विवाद 19 वर्ष तक अदालतों में चलता रहा, लेकिन आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की नियमित द्वितीय अपील को खारिज करते हुए इस लंबे कानूनी विवाद पर विराम लगा दिया।</p>
<p>हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मूल वाद की राशि 25 हजार रुपये से कम हो तो सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 102 के तहत नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं होती। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने यह फैसला हरियाणा सरकार और उसके अधिकारियों द्वारा दायर अपील पर सुनाया</p>
<p><strong>7299 यात्रा भत्ता बिलों का नहीं किया भुगतान</strong><br />
मामले की शुरुआत उस समय हुई जब रोहतक के ओपी खन्ना ने अपने लंबित टीए बिलों के भुगतान के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया।</p>
<p>रिकॉर्ड के अनुसार दिसंबर 1999 से अप्रैल 2002 के बीच विभिन्न सरकारी दौरों से संबंधित 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता बिलों का भुगतान नहीं किया गया था। खन्ना ने दावा किया कि बिलों का भुगतान अनुचित रूप से रोका गया है और उन्होंने राशि के साथ ब्याज की भी मांग की।</p>
<p>दूसरी ओर हरियाणा सरकार का पक्ष था कि संबंधित टीए बिलों को बजट की अनुपलब्धता तथा स्थानीय यात्रा भत्ता और किलोमीटर संबंधी दावों पर उठाई गई आपत्तियों के कारण रोका गया था। विभाग ने यह भी कहा कि मामले को उद्योग निदेशक, हरियाणा के पास स्पष्टीकरण और मार्गदर्शन के लिए भेजा गया था तथा उठाई गई आपत्तियों की जानकारी कर्मचारी को दे दी गई थी।</p>
<p><strong>रोहतक की अदालत में दायर की अपील</strong><br />
वर्ष 2006 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन), रोहतक ने ओपी खन्ना का मुकदमा खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने जिला जज, रोहतक की अदालत में अपील दायर की</p>
<p>प्रथम अपीलीय अदालत ने 1 फरवरी 2007 को निचली अदालत का फैसला पलटते हुए खन्ना के पक्ष में निर्णय दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए हरियाणा सरकार ने हाई कोर्ट में नियमित द्वितीय अपील दाखिल कर दी।</p>
<p>सरकार की ओर से दलील दी गई कि चूंकि मूल विवादित राशि 10 हजार रुपये से कम थी, इसलिए प्रथम अपील ही सुनवाई योग्य नहीं थी। वहीं न्याय मित्र अंकुर मित्तल ने अदालत को बताया कि सीपीसी की धारा 102 स्पष्ट रूप से कहती है कि 25 हजार रुपये से कम राशि वाले मामलों में दूसरी अपील नहीं की जा सकती। इसलिए सरकार की यह अपील प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकार्य है।</p>
<p><strong>कई गुना अधिक रकम मुकदमेबाजी में खर्च की</strong><br />
हाई कोर्ट ने सरकारी विभागों द्वारा बेहद छोटी रकम के मामलों में वर्षों तक मुकदमेबाजी करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि कई बार सरकारी विभाग विवादित राशि से कई गुना अधिक रकम मुकदमेबाजी पर खर्च कर देते हैं। इससे न केवल सार्वजनिक धन की बर्बादी होती है, बल्कि न्यायालयों का बहुमूल्य समय भी ऐसे मामलों में खर्च होता है।</p>
<p>जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि मूल वाद की राशि मात्र 7,299 रुपये थी, जो 25 हजार रुपये की वैधानिक सीमा से काफी कम है। ऐसे में सीपीसी की धारा 102 के स्पष्ट परविधान के कारण नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं है। अदालत ने इसी आधार पर हरियाणा सरकार की अपील को खारिज कर दिया।</p>
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