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	<title>Jharkhand High Court &#8211; NewsX 24</title>
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	<title>Jharkhand High Court &#8211; NewsX 24</title>
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		<title>अलकतरा चालान गड़बड़ी मामले में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, सेवानिवृत्त अभियंता पर कार्रवाई रद</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 17 Aug 2026 15:53:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बिहार/झारखंड]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[Jharkhand High Court]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;रांची &#160;हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत में अलकतरा चालान गड़बड़ी के मामले में सेवानिवृत्त सहायक अभियंता सुरेंद्र प्रसाद की याचिका पर सोमवार को सुनवाई हुई। अदालत ने विभागीय जांच में दी गई वेतन कटौती और सरकारी राशि की वसूली के आदेश को रद कर दिया। अदालत ने कहा कि विभागीय जांच में &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;<strong>रांची</strong><br />
&nbsp;हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत में अलकतरा चालान गड़बड़ी के मामले में सेवानिवृत्त सहायक अभियंता सुरेंद्र प्रसाद की याचिका पर सोमवार को सुनवाई हुई। अदालत ने विभागीय जांच में दी गई वेतन कटौती और सरकारी राशि की वसूली के आदेश को रद कर दिया।</p>
<p>अदालत ने कहा कि विभागीय जांच में केवल सीबीआइ की चार्जशीट या जांच के दौरान जुटाए गए दस्तावेजों को सबूत नहीं माना जा सकता। दस्तावेजों की सामग्री को सक्षम गवाह के माध्यम से साबित करना जरूरी है, ताकि संबंधित कर्मचारी को प्रति परीक्षण का प्रभावी अवसर मिल सके। अदालत ने सुरेंद्र प्रसाद को उन सभी परिणामी लाभों का हकदार माना, जो उक्त दंड आदेश के कारण उन्हें नहीं मिल सके था।</p>
<p>अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे रिकार्ड की जांच कर परिणामी लाभों की गणना करें और आवश्यक आदेश जारी करते हुए इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से 12 सप्ताह के भीतर उन्हें लाभ प्रदान करें।</p>
<p>अदालत ने कहा कि विभाग यह साबित नहीं कर सका कि कितनी मात्रा में अलकतरा का कथित कम उपयोग हुआ, उसका मूल्य कितना था। ठेकेदार से कितनी राशि वसूल की जानी थी और सुरेंद्र प्रसाद की व्यक्तिगत जिम्मेदारी के कारण सरकारी खजाने को कितना नुकसान हुआ।</p>
<p>अदालत ने कहा कि बिना प्रमाण और स्पष्ट गणना के वेतन या पेंशन संबंधी लाभों से वसूली नहीं की जा सकती। विभाग ने वर्ष 2015 में सुरेंद्र प्रसाद के वेतन को उनके पद के न्यूनतम वेतनमान तक घटाने और कथित सरकारी नुकसान की आनुपातिक राशि वसूलने का आदेश दिया था।</p>
<p>सुरेंद्र प्रसाद ग्रामीण अभियंत्रण संगठन (वर्तमान में ग्रामीण कार्य विभाग) में सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत थे और वर्ष 2019 में सेवानिवृत्त हुए। मामला वर्ष 2004-05 में बानो से पबुरा-निमतुर-पनगुर पथ के निर्माण एवं मरम्मत कार्य से जुड़ा था।</p>
<p>विभाग ने आरोप लगाया था कि ठेकेदार द्वारा अलकतरा की खरीद से संबंधित कथित फर्जी चालानों पर सहायक अभियंता ने काउंटर साइन किया था, जिससे ठेकेदार को अनुचित भुगतान का लाभ मिला और सरकारी खजाने को नुकसान हुआ।</p>
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		<title>रांची के तीन डैमों से अतिक्रमण हटाने पर हाईकोर्ट ने रिपोर्ट मांगी</title>
		<link>https://newsx24.com/high-court-seeks-report-on-removal-of-encroachments-from-three-ranchi-dams/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 07 Aug 2026 13:03:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बिहार/झारखंड]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[Jharkhand High Court]]></category>
		<category><![CDATA[top-news]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;रांची &#160;हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत में रांची के तीन प्रमुख जलस्रोत धुर्वा, कांके और गेतलसूद डैम की जमीन पर अतिक्रमण के खिलाफ दाखिल जनहित याचिका पर गुरुवार को सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान जलस्रोतों से अतिक्रमण हटाने से संबंधित रिपोर्ट राज्य सरकार की ओर से अदालत &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;<strong>रांची</strong><br />
&nbsp;हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत में रांची के तीन प्रमुख जलस्रोत धुर्वा, कांके और गेतलसूद डैम की जमीन पर अतिक्रमण के खिलाफ दाखिल जनहित याचिका पर गुरुवार को सुनवाई हुई।</p>
<p>सुनवाई के दौरान जलस्रोतों से अतिक्रमण हटाने से संबंधित रिपोर्ट राज्य सरकार की ओर से अदालत में दाखिल की गई। अदालत ने सरकार को रिपोर्ट की प्रति एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।</p>
<p>साथ ही, न्याय मित्र को रांची डीसी की रिपोर्ट का अध्ययन कर अपना प्रति उत्तर दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को होगी। इससे पहले हाई कोर्ट ने रांची के उपायुक्त को विस्तृत शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया था।</p>
<p>कोर्ट ने तीनों डैम परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित जमीन का सटीक विवरण और नक्शा मांगा था। इसके साथ ही अधिग्रहित जमीन पर हुए अतिक्रमण का सर्वे नंबर सहित पूरा ब्योरा और अतिक्रमण हटाने के लिए अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी देने को कहा था।</p>
<p>पूर्व की सुनवाई में कोर्ट को बताया गया था कि धुर्वा, कांके और गेतलसूद डैम तथा उनसे जुड़े जलाशयों की जमीन पर अतिक्रमण से संबंधित आवश्यक दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं। इसके बाद रांची डीसी की रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल करने की बात कही गई थी।</p>
<p>मामले में धुर्वा डैम परियोजना की जमीन पर अतिक्रमण का मुद्दा भी कोर्ट के समक्ष आ चुका है। एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने इससे संबंधित प्राथमिकी की जांच की सीलबंद रिपोर्ट कोर्ट में पेश की थी।</p>
<p>एसीबी की ओर से अदालत को बताया था कि हाई कोर्ट के सात जनवरी के आदेश के बाद नगड़ी थाना में प्राथमिकी दर्ज की गई है। इस मामले की जांच अभी जारी है।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<item>
		<title>झारखंड निजी विश्वविद्यालय अधिनियम संशोधन पर हाईकोर्ट ने सरकार को दी छूट</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Jul 2026 09:02:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बिहार/झारखंड]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[Jharkhand High Court]]></category>
		<category><![CDATA[top-news]]></category>
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					<description><![CDATA[रांची &#160;हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने स्पष्ट किया है कि झारखंड निजी विश्वविद्यालय अधिनियम, 2024 में संशोधन करने की राज्य सरकार की विधायी शक्ति पर अदालत के अंतरिम आदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अदालत ने कहा कि सामान्यतः न्यायालय किसी विधायिका को कानून बनाने या उसमें &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रांची</strong><br />
&nbsp;हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने स्पष्ट किया है कि झारखंड निजी विश्वविद्यालय अधिनियम, 2024 में संशोधन करने की राज्य सरकार की विधायी शक्ति पर अदालत के अंतरिम आदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।</p>
<p>अदालत ने कहा कि सामान्यतः न्यायालय किसी विधायिका को कानून बनाने या उसमें संशोधन करने से नहीं रोकता। न्यायालय की भूमिका कानून बनने के बाद उसकी संवैधानिक वैधता की जांच तक सीमित रहती है। उक्त बातें खंडपीठ ने सरला बिरला विश्वविद्यालय सहित विभिन्न निजी विश्वविद्यालयों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कही।</p>
<p>सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता रोहितश्य राय ने अदालत को बताया कि झारखंड निजी विश्वविद्यालय अधिनियम, 2024 की कई धाराओं में संशोधन प्रस्तावित है। इनमें वे प्रविधान भी सम्मिलित हैं, जिन्हें निजी विश्वविद्यालयों ने अपनी याचिकाओं में चुनौती दी है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि 28 जनवरी 2025 को हाई कोर्ट द्वारा पारित अंतरिम स्थगन आदेश के कारण संशोधन विधेयक को विधानसभा में लाने को लेकर कुछ आशंकाएं उत्पन्न हो गई थीं। इस पर खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि 28 जनवरी 2025 का अंतरिम आदेश केवल 11 दिसंबर 2024 की अधिसूचना के आधार पर आगे की कार्रवाई पर रोक लगाने तक सीमित था।</p>
<p>इसका राज्य विधानसभा की कानून बनाने अथवा किसी अधिनियम में संशोधन करने की संवैधानिक शक्ति से कोई संबंध नहीं है। अदालत ने कहा कि उसके पूर्व आदेश में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो राज्य सरकार को झारखंड निजी विश्वविद्यालय अधिनियम, 2024 या उससे संबंधित किसी अन्य कानून में संशोधन प्रस्ताव पर विचार करने से रोकता हो।</p>
<p>खंडपीठ ने यह भी कहा कि यदि प्रस्तावित संशोधनों के बाद प्रार्थियों की शिकायतों का पूर्ण या पर्याप्त समाधान हो जाता है, तो 28 जनवरी 2025 को दिए गए अंतरिम संरक्षण को जारी रखने की आवश्यकता पर भी विचार किया जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा अंतरिम आदेश में संशोधन अथवा उसे निरस्त करने के लिए दायर अंतरिम आवेदन लंबित है।</p>
<p>हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि इस मामले में की गई टिप्पणियां उन अन्य संबंधित याचिकाओं पर भी समान रूप से लागू होंगी, जिनमें इसी प्रकार के अंतरिम आदेश पारित किए गए हैं।</p>
<p>महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि प्रस्तावित संशोधन विधेयक पर राज्य विधानसभा के आगामी मानसून सत्र में विचार किए जाने की संभावना है। इसके बाद खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई दो सितंबर निर्धारित कर दी।</p>
<p><strong>क्या है मामला?</strong><br />
झारखंड निजी विश्वविद्यालय अधिनियम, 2024 के कई प्रविधानों का राज्य के निजी विश्वविद्यालय विरोध कर रहे हैं। अधिनियम के तहत निजी विश्वविद्यालयों को 15 दिनों के भीतर एक करोड़ रुपये लाइसेंस शुल्क जमा करने का प्रविधान किया गया है।</p>
<p>इसके अलावा कुलपति की नियुक्ति, संचालकों की शैक्षणिक योग्यता तथा अन्य प्रशासनिक एवं नियामकीय प्रविधानों को लेकर भी आपत्ति जताई गई है। पूर्व में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार की अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी थी।</p>
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		<item>
		<title>झारखंड हाई कोर्ट ने 450 एकड़ वन भूमि मामले में CBI-ED जांच से किया इनकार</title>
		<link>https://newsx24.com/jharkhand-high-court-refuses-cbi-ed-probe-in-450-acre-forest-land-case/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Jul 2026 12:20:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बिहार/झारखंड]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[Jharkhand High Court]]></category>
		<category><![CDATA[top-news]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;रांची झारखंड हाई कोर्ट ने कथित 450 एकड़ वन भूमि की अवैध बिक्री और कब्जे के मामले में दायर जनहित याचिका का निपटारा करते हुए सीबीआइ और ईडी से जांच कराने की मांग ठुकरा दी। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता शिव शंकर शर्मा के आरोप अधिकांशतः &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;<strong>रांची</strong><br />
झारखंड हाई कोर्ट ने कथित 450 एकड़ वन भूमि की अवैध बिक्री और कब्जे के मामले में दायर जनहित याचिका का निपटारा करते हुए सीबीआइ और ईडी से जांच कराने की मांग ठुकरा दी।</p>
<p>चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता शिव शंकर शर्मा के आरोप अधिकांशतः अतिरंजित और अपुष्ट है। साथ ही उनकी विश्वसनीयता पर भी पहले से सवाल उठ चुका है। इसलिए केवल आरोपों के आधार पर सीबीआई या ईडी जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।</p>
<p>अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि वन विभाग और अन्य सक्षम प्राधिकारियों ने याचिका दायर होने से पहले ही कथित अतिक्रमण और वन भूमि के हस्तांतरण की जांच शुरू कर दी थी तथा जहां अनियमितताएं मिली, वहां कार्रवाई भी की जा रही है।</p>
<p>जांच में यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता द्वारा 450 एकड़ वन भूमि के अवैध हस्तांतरण का दावा सही नहीं है। खंडपीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता वन अधिकारियों और अन्य उच्च पदस्थ अधिकारियों पर मिलीभगत के आरोपों का कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका।</p>
<p>रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ कि कथित बिक्री विलेखों में वन विभाग द्वारा कोई एनओसी जारी नहीं किया गया था। अदालत ने कहा कि इस मामले में जांच एजेंसियों की निष्क्रियता या पक्षपात का कोई प्रमाण नहीं है, इसलिए सीबीआइ या ईडी जांच का कोई औचित्य नहीं बनता।</p>
<p>हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश किसी भी आरोपित को क्लीन चिट नहीं है और लंबित कानूनी कार्रवाई कानून के अनुसार जारी रहेगी। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की साख और मंशा पर गंभीर सवाल उठाया है।</p>
<p><strong>सेवानिवृत्ति लाभ का भुगतान नहीं होने पर मांडर कालेज के प्राचार्य तलब</strong><br />
झारखंड हाई कोर्ट ने व्याख्याता की मृत्यु के पांच वर्ष बाद भी मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभ का भुगतान नहीं किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने मांडर कालेज की ओर से लगातार दो सुनवाई में कोई पक्ष नहीं रखे जाने और भुगतान संबंधी जानकारी नहीं देने पर कॉलेज के प्राचार्य को सात अगस्त को अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया।</p>
<p>याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि उनके पति मांडर कालेज में व्याख्याता थे और वर्ष 2021 में उनका निधन हो गया था। हाई कोर्ट ने वर्ष 2024 में पंचम, छठे और सप्तम वेतनमान सहित सभी बकाया लाभ देने का आदेश दिया था।</p>
<p>बाद में उच्च शिक्षा विभाग ने वेतनमान संबंधी बकाया राशि का भुगतान कर दिया, लेकिन मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभ अब तक नहीं दिया गया। इस पर अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए प्राचार्य की व्यक्तिगत उपस्थिति सुनिश्चित करने का आदेश दिया।</p>
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		<item>
		<title>झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: DRAT अध्यक्ष की स्थगन शक्ति पर लगाई रोक</title>
		<link>https://newsx24.com/major-ruling-by-jharkhand-high-court-drat-chairpersons-power-to-grant-stays-curbed/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 27 Jun 2026 16:26:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बिहार/झारखंड]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[Jharkhand High Court]]></category>
		<category><![CDATA[top-news]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;रांची &#160;झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि डेट्स रिकवरी अपीलेट ट्रिब्यूनल (डीआरएटी) के अध्यक्ष अपनी प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल कर कोई न्यायिक या स्थगन आदेश पारित नहीं कर सकते। अदालत ने कर्जदार द्वारा अपनाई गई कानूनी दांवपेच की रणनीति बताते हुए उनकी कड़ी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;<strong>रांची</strong><br />
&nbsp;झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि डेट्स रिकवरी अपीलेट ट्रिब्यूनल (डीआरएटी) के अध्यक्ष अपनी प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल कर कोई न्यायिक या स्थगन आदेश पारित नहीं कर सकते।</p>
<p>अदालत ने कर्जदार द्वारा अपनाई गई कानूनी दांवपेच की रणनीति बताते हुए उनकी कड़ी निंदा की और बैंक को सफल नीलामी खरीदार के पक्ष में तुरंत सेल सर्टिफिकेट जारी करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि कर्जदार पर 77 करोड़ से अधिक का बकाया है।</p>
<p>यह जनता का पैसा है जिसे कानूनन वसूला जाना जरूरी है। कर्जदार ने लोन चुकाने का कोई प्रयास नहीं किया, बल्कि केवल वसूली प्रक्रिया को टालने के लिए कानूनी दांवपेंच अपनाए।</p>
<p>एकल पीठ ने उक्त निर्णय इंडियन बैंक बनाम मां ललिता हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड और नीलामी खरीदार यशोदा हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर लिमिटेड द्वारा दायर दो अलग-अलग रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया।</p>
<p><strong>क्या है पूरा मामला?</strong><br />
देवघर स्थित मां ललिता हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ने अस्पताल स्थापित करने के लिए इंडियन बैंक (पूर्व में इलाहाबाद बैंक) से करोड़ों रुपये का लोन लिया था, जो बाद में बढ़कर ₹19.45 करोड़ तक पहुंच गया।</p>
<p>लोन न चुकाने के कारण 31 दिसंबर 2009 को इस खाते को एनपीए घोषित कर दिया गया। साल 2015 में बैंक और अस्पताल प्रबंधन के बीच एक समझौता हुआ, जिसके बाद बैंक ने अस्पताल की जब्त संपत्ति वापस लौटा दी। लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया। इसके बाद बैंक ने करीब 70.92 करोड़ की बकाया राशि की वसूली के लिए सरफेसी एक्ट के तहत नए सिरे से कार्रवाई शुरू की।</p>
<p>बैंक ने सात अप्रैल 2026 को अस्पताल की संपत्तियों की नीलामी की, जिससे 44.22 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। इस नीलामी में यशोदा हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर लिमिटेड सबसे बड़ा बोलीदाता बनकर उभरा और उसने पूरी रकम जमा कर दी।</p>
<p><strong>डीआरएटी के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती</strong><br />
ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी), रांची के बंद होने का हवाला देते हुए कर्जदार अस्पताल ने इलाहाबाद स्थित अपीलेट ट्रिब्यूनल (डीआरएटी) में याचिका दाखिल की<br />
डीआरएटी के अध्यक्ष ने आरडीबी एक्ट की धारा 17ए के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 10 अप्रैल 2026 को बैंक को नीलामी की रकम स्वीकार करने की अनुमति तो दी, लेकिन खरीदार को सेल सर्टिफिके जारी करने पर रोक लगा दी थी। इस स्थगन आदेश के खिलाफ बैंक और नीलामी खरीदार दोनों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।</p>
<p><strong>हाई कोर्ट की अहम टिप्पणियां और फैसला</strong><br />
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद डीआरएटी के आदेश को पूरी तरह अधिकार क्षेत्र से बाहर माना। पीठ ने कहा कि कर्जदार ने कोर्ट में पहले भी अर्जी दी थी, जहां उन्हें राहत पाने के लिए दो करोड़ जमा करने को कहा गया था, लेकिन उन्होंने वह राशि जमा नहीं की और चालाकी से डीआरएटी में बिना कोई प्री-डिपाजिट किए राहत पा ली, जो कि पूरी तरह से अनुचित है।</p>
<p>अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए डीआरएटी द्वारा 10 अप्रैल 2026 और 21 अप्रैल 2026 को जारी अंतरिम स्थगन आदेशों को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि अब बैंक द्वारा नीलामी खरीदार के पक्ष में सेल सर्टिफिकेट जारी करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>झारखंड हाईकोर्ट सख्त, ऑनलाइन भूमि रिकॉर्ड में सुधार के दिए निर्देश</title>
		<link>https://newsx24.com/jharkhand-high-court-takes-a-firm-stand-issues-directives-to-rectify-online-land-records/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Jun 2026 16:26:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रांची &#160;झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने राज्य में आनलाइन भूमि अभिलेखों में लगातार हो रही त्रुटियों और विसंगतियों पर चिंता जताते हुए बुधवार को महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि आनलाइन भूमि रिकार्ड भौतिक अभिलेखों की हूबहू कापी होनी चाहिए। इसके लिए अब सभी डिजिटल भूमि &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रांची</strong><br />
&nbsp;झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने राज्य में आनलाइन भूमि अभिलेखों में लगातार हो रही त्रुटियों और विसंगतियों पर चिंता जताते हुए बुधवार को महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि आनलाइन भूमि रिकार्ड भौतिक अभिलेखों की हूबहू कापी होनी चाहिए।</p>
<p>इसके लिए अब सभी डिजिटल भूमि अभिलेखों का संबंधित अंचल अधिकारियों (सीओ) द्वारा सत्यापन किया जाएगा और सत्यापन के बाद ही उन्हें डिजिटल हस्ताक्षर के साथ पोर्टल पर प्रदर्शित किया जाएगा। अदालत ने राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव को आदेश का तत्काल अनुपालन सुनिश्चित करने तथा सभी संबंधित अधिकारियों को आवश्यक प्रशासनिक निर्देश जारी करने को कहा है।</p>
<p>वहीं, प्रार्थी को तीन सप्ताह के भीतर अंचल अधिकारी कुड़ू के समक्ष आवेदन देने का निर्देश देते हुए कहा गया कि मामले का निष्पादन 12 सप्ताह के भीतर किया जाए। अदालत ने प्रार्थी राम प्रकाश भगत की याचिका की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया।</p>
<p>प्रार्थी ने शिकायत की थी कि उसके पूर्वजों के नाम दर्ज भूमि का रिकार्ड भौतिक दस्तावेजों में सही है, लेकिन आनलाइन रजिस्टर और डिजिटल रिकार्ड में किसी अन्य व्यक्ति का नाम दर्ज हो गया है, जिसके कारण उसे परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<p>सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि राज्य में बड़ी संख्या में रैयत इसी तरह की शिकायतों के साथ हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर रहे हैं। अदालत ने कहा कि डेटा एंट्री में हुई मानवीय त्रुटियों और पर्याप्त सत्यापन तंत्र के अभाव में आनलाइन रिकार्ड और भौतिक अभिलेखों के बीच अंतर उत्पन्न हो रहा है, जिससे नागरिकों को अनावश्यक मुकदमेबाजी करनी पड़ रही है।</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, सभी मामलों में Zero FIR दर्ज करना अनिवार्य</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 09 Jun 2026 11:11:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बिहार/झारखंड]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;रांची झारखंड हाई कोर्ट ने महिलाओं और यौन हिंसा की पीड़िताओं के अधिकारों, सुरक्षा, न्याय और पुनर्वास से जुड़े एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका मामले में राज्य सरकार, पुलिस विभाग और संबंधित एजेंसियों को कई अहम निर्देश दिए हैं. अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी संज्ञेय अपराध, विशेषकर यौन हिंसा और POCSO मामलों में, क्षेत्राधिकार &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;<strong>रांची</strong><br />
झारखंड हाई कोर्ट ने महिलाओं और यौन हिंसा की पीड़िताओं के अधिकारों, सुरक्षा, न्याय और पुनर्वास से जुड़े एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका मामले में राज्य सरकार, पुलिस विभाग और संबंधित एजेंसियों को कई अहम निर्देश दिए हैं. अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी संज्ञेय अपराध, विशेषकर यौन हिंसा और POCSO मामलों में, क्षेत्राधिकार का हवाला देकर FIR दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता और Zero FIR दर्ज करना पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी है. मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने 8 जून 2026 को सुनाए गए फैसले में कहा कि Zero FIR दर्ज नहीं करना कानून के उल्लंघन के समान है.</p>
<p><strong>Zero FIR दर्ज करने में लापरवाही पर अदालत सख्त</strong><br />
झारखंड हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को BNSS 2023 की धारा 173 के तहत Zero FIR दर्ज करने की व्यवस्था को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने कहा कि किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. इसके साथ ही अदालत ने पुलिसकर्मियों के लिए नियमित प्रशिक्षण और संवेदनशीलता कार्यक्रम चलाने के भी आदेश दिए हैं. साथ ही, अदालत ने महिला और बाल विकास विभाग को राज्यभर में वन-स्टॉप सेंटरों की कार्यप्रणाली को मजबूत करने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने यह भी कहा कि इन केंद्रों की निगरानी के लिए एक समिति बनाई जाए ताकि मामलों का समय पर निपटारा सुनिश्चित हो सके.</p>
<p><strong>यौन हिंसा पीड़ितों के लिए राहत और पुनर्वास पर जोर</strong><br />
हाईकोर्ट ने यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास के लिए सरकार को और प्रभावी कदम उठाने को कहा है. अदालत ने पाया कि कई मामलों में पीड़ितों को समय पर सहायता नहीं मिलती, जिससे प्रक्रिया प्रभावित होती है. इसलिए अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़ितों को तुरंत कानूनी और सामाजिक सहायता मिलनी चाहिए.</p>
<p>दुष्कर्म पीड़ित बच्चों को मुफ्त शिक्षा और छात्रवृत्ति का आदेश<br />
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि हर जिले में एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति की जाए, जो दुष्कर्म से जन्मे बच्चों की शिक्षा और समग्र विकास की निगरानी करेगा. ऐसे बच्चों को बारहवीं कक्षा तक मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी.वहीं, यदि कोई छात्र आईआईटी, एनआईटी, एम्स या आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश प्राप्त करता है, तो उसे उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति का लाभ भी दिया जाए.</p>
<p><strong>प्रमुख निर्देश और व्यवस्था</strong></p>
<ul>
<li>हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमे की शुरुआत में ही ट्रायल कोर्ट यह तय करे कि पीड़िता को अंतरिम राहत देने की जरूरत है या नहीं.</li>
<li>मामले का अंतिम फैसला चाहे किसी भी रूप में आए, पीड़िता के लिए अंतिम मुआवजा तय करना जरूरी होगा.</li>
<li>मुआवजे की राशि का भुगतान 30 दिनों के अंदर करने का निर्देश दिया गया है.</li>
<li>यौन अपराध से जुड़े मामलों का निपटारा तय समयसीमा में हो और इसके लिए बीएनएसएस की धारा 346 का पालन किया जाए.</li>
<li>अदालतों को बेवजह तारीख पर तारीख देने से बचने को कहा गया है, ताकि मामलों का जल्द निष्पादन हो सके.</li>
<li>पुलिस महानिदेशक को एक विशेष निगरानी दल बनाने का निर्देश दिया गया है, जो समय-समय पर ऐसे मामलों की समीक्षा करेगा.</li>
<li>मीडिया, पुलिस और न्यायालय से जुड़े सभी कर्मियों को पीड़िता की पहचान गोपनीय रखने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करना होगा.</li>
<li>पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करने या उसकी गोपनीयता भंग करने वालों पर सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाएगी.</li>
<li>दुष्कर्म के मामलों की प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर पूरी करने को कहा गया है.</li>
<li>अंतिम जांच दो महीने के अंदर समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया है.</li>
<li>सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को पीड़ितों को तत्काल कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है.</li>
<li>पॉक्सो से जुड़े मामलों में 24 घंटे के भीतर आश्रय, सुरक्षा और चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित करनी होगी.</li>
<li>यौन अपराध से पीड़ित महिलाओं और बच्चियों का बयान महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ही दर्ज किया जाएगा.</li>
<li>सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में प्रतिबंधित चिकित्सीय जांच पद्धति पर पूरी तरह रोक लगाने और उसका सख्ती से पालन कराने का निर्देश दिया गया है.</li>
<li>अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रतिबंध का उल्लंघन गंभीर पेशेवर कदाचार माना जाएगा.</li>
<li>दूरस्थ क्षेत्रों की किशोरियों और महिलाओं के लिए कानूनी जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएंगे.</li>
<li>स्कूलों, कॉलेजों और गांवों में निःशुल्क आत्मरक्षा प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने पर जोर दिया गया है.</li>
<li>यदि किसी पीड़िता और उसके परिवार को सामाजिक कारणों से स्थान बदलना पड़े, तो सरकार उनके पुनर्वास की उचित व्यवस्था करेगी.</li>
<li>महिला हेल्पलाइन 181 को और अधिक प्रभावी बनाने तथा उसे आपातकालीन सेवा 112 से जोड़ने पर विचार करने का निर्देश दिया गया है.</li>
</ul>
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		<title>शिक्षकों के वेतन पर राहत: हाईकोर्ट ने 16,290 रुपये न्यूनतम वेतन देने का दिया आदेश</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 May 2026 16:12:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बिहार/झारखंड]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[Jharkhand High Court]]></category>
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					<description><![CDATA[रांची झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने एक महत्वपूर्ण आदेश में राज्य के प्राथमिक स्कूलों में कार्यरत सहायक शिक्षकों को एमएसीपी योजना का लाभ दिए जाने के मामले में सरकार को 16 सप्ताह के भीतर अंतिम निर्णय लेने का निर्देश दिया है। एकल पीठ ने जामताड़ा जिले के 84 शिक्षकों की &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रांची</strong></p>
<p>झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने एक महत्वपूर्ण आदेश में राज्य के प्राथमिक स्कूलों में कार्यरत सहायक शिक्षकों को एमएसीपी योजना का लाभ दिए जाने के मामले में सरकार को 16 सप्ताह के भीतर अंतिम निर्णय लेने का निर्देश दिया है। एकल पीठ ने जामताड़ा जिले के 84 शिक्षकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए उक्त आदेश पारित किया है।</p>
<p>याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स और शिवम पाठक ने अदालत को बताया कि राज्य के अन्य स्कूलों (जैसे अल्पसंख्यक स्कूल, आवासीय विद्यालय) तथा बिहार राज्य के शिक्षकों को एमएसीपी का लाभ पहले से दिया जा रहा है, जबकि प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों को यह सुविधा नहीं मिल पाई है।</p>
<p>याचिका में राज्य सरकार के स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे इन शिक्षकों को भी एमएसीपी का लाभ दें। अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि सरकार ने सात अगस्त 2024 को झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ को पत्र लिखकर एमएसीपी की प्रक्रिया शुरू करने का आश्वासन दिया था, लेकिन उसके बाद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।</p>
<p>कोर्ट ने कहा कि चूंकि अन्य विद्यालयों के शिक्षकों को यह लाभ मिल रहा है और सरकार ने इस विषय पर विचार-विमर्श शुरू भी कर दिया है, इसलिए यह आवश्यक है कि प्राथमिक शिक्षकों के संबंध में भी जल्द से जल्द फैसला लिया जाए।</p>
<p>अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सरकार इस मामले में अंतिम निर्णय लें। पूरी प्रक्रिया इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से 16 सप्ताह के भीतर पूरी की जाए। अदालत ने याचिका निष्पादित कर दी।</p>
<p><strong>16,290 रुपये मासिक न्यूनतम वेतन देने का आदेश</strong><br />
हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने पूर्वी सिंहभूम जिले के 80 प्रशिक्षित प्राथमिक शिक्षकों की याचिका को स्वीकार करते हुए उन्हें 16,290 रुपये मासिक न्यूनतम वेतन देने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता मैट्रिक और इंटरमीडिएट प्रशिक्षित शिक्षक हैं, जिन्होंने वर्ष 2006 से पहले सेवा में आए थे।</p>
<p>उनकी मांग थी कि छठें वेतन आयोग की संस्तुतियों के तहत जारी वित्त विभाग के प्रस्ताव के अनुसार उनका प्रारंभिक वेतन एक जनवरी 2006 से 16,290 रुपये निर्धारित किया जाए। शिक्षकों ने शिक्षा विभाग के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि यह वेतनमान केवल झारखंड सचिवालय के सहायकों पर लागू होता है।</p>
<p>अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि यह मामला पूर्व में एक मामले में कोर्ट के निर्णय (27 नवंबर 2025) से पूरी तरह आच्छादित है। अदालत ने शिक्षकों के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए विभाग के 10 जून 2024 के सरकार के आदेश को निरस्त कर दिया।</p>
<p>अदालत ने राज्य को निर्देश दिया कि वह इन याचिकाकर्ताओं को वही, लाभ प्रदान करे जो पिछले मामले के याचिकाकर्ताओं को दिए गए थे। सरकारी अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पिछले संबंधित मामले के निर्णय के खिलाफ सरकार ने खंडपीठ में अपील दायर कर दी है।</p>
<p>इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि अपील के आदेश से शिक्षकों न्यूनतम वेतनमान प्रभावित होगा। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिजीत कुमार सिंह ने पक्ष रखा।</p>
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		<title>CSIR सेवानिवृत्त कर्मचारी आवास किराया मामले में 16 लाख बढ़ोतरी पर सवाल</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Apr 2026 16:01:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बिहार/झारखंड]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[Jharkhand High Court]]></category>
		<category><![CDATA[top-news]]></category>
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					<description><![CDATA[रांची झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत में सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ माइनिंग एंड फ्यूल रिसर्च (सीएसआइआर), धनबाद के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के सरकारी आवास के किराया बिल में छह माह के भीतर एक लाख रुपये से बढ़कर 16 लाख रुपये हो जाने के मामले सुनवाई हुई। सुनवाई के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रांची</strong></p>
<p>झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत में सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ माइनिंग एंड फ्यूल रिसर्च (सीएसआइआर), धनबाद के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के सरकारी आवास के किराया बिल में छह माह के भीतर एक लाख रुपये से बढ़कर 16 लाख रुपये हो जाने के मामले सुनवाई हुई।</p>
<p>सुनवाई के बाद अदालत ने कड़ी नाराजगी जताते हुए CSIR के निदेशक से पूछा कि आखिर इतनी कम अवधि में हाउस रेंट की राशि में इतना बढ़ोतरी कैसे हो गई।</p>
<p>खंडपीठ ने CSIR के निदेशक को निर्देश दिया कि सेवानिवृत्त कर्मी गोपाल चंद्र लोहार के 16 लाख रुपये के हाउस रेंट बिल का पुनर्मूल्यांकन कर नए सिरे से गणना की जाए।</p>
<p>मामले की अगली सुनवाई एक मई को निर्धारित की गई है। सुनवाई के दौरान कोर्ट के पूर्व आदेश के अनुपालन में सीएसआइआर के निदेशक, सेक्शन अफसर और प्रशासनिक अधिकारी अदालत में उपस्थित हुए।</p>
<p>अदालत ने अगली सुनवाई में निदेशक को व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे दी, लेकिन सेक्शन अफसर और प्रशासनिक अधिकारी को उपस्थित रहने का निर्देश दिया।</p>
<p>प्रार्थी गोपाल चंद्र लोहार वर्ष 1989 में सीएसआइआर धनबाद में टेक्नीशियन पद पर नियुक्त हुए थे। वह 31 दिसंबर 2021 को सेवानिवृत्त हुए। आरोप है कि सेवानिवृत्ति के बाद करीब आठ माह तक उन्हें सेवानिवृत्ति लाभ का भुगतान नहीं किया गया।</p>
<p>संस्थान की ओर से उन्हें पत्र देकर सूचित किया गया था कि सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें आवंटित आवास का किराया 9,995 रुपये प्रतिमाह देना होगा। 17 अप्रैल 2023 को संस्थान ने उन्हें आवास किराया का बकाया 1,06,403 रुपये बताया।</p>
<p>इसके बाद नवंबर 2023 में उन्होंने आवास खाली कर दिया। बाद में संस्थान ने आवास किराया बकाया राशि बढ़ाकर 16,11,163 रुपये बता दिया।</p>
<p>प्रार्थी का आरोप है कि ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट मद में बकाया लगभग 23 लाख रुपये में से 16 लाख रुपये काटने की मंशा से यह राशि बढ़ाई गई।</p>
<p><strong>ट्रिब्यूनल के आदेश पर भी सवाल</strong><br />
प्रार्थी ने सरकारी क्वार्टर के किराया एवं दंडात्मक शुल्क की गणना को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है। उनका कहना है कि ट्रिब्यूनल ने बिना उचित कारण बताए उनकी याचिका खारिज कर दी और आदेश अत्यंत संक्षिप्त दिया।</p>
<p>हाई कोर्ट ने पूर्व की सुनवाई में टिप्पणी करते हुए था कि 17 अप्रैल 2023 को 1,06,403 रुपये और 22 अप्रैल 2024 को 16,11,163 रुपये की गणना के बीच भारी अंतर है, जबकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इतनी वृद्धि किस आधार पर हुई।</p>
<p>अदालत ने यह भी कहा था कि पहली गणना प्रशासनिक अधिकारी ने की थी, जबकि बाद की गणना उससे निम्न स्तर के सेक्शन अफसर द्वारा की गई। ट्रिब्यूनल ने बिना जवाब मांगे ही मामले का निपटारा कर दिया, जो प्रथम दृष्टया उचित नहीं प्रतीत होता।</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>बोकारो लापता लड़की केस: हाईकोर्ट सख्त, DGP और SP को 16 अप्रैल को तलब</title>
		<link>https://newsx24.com/bokaro-missing-girl-case-high-court-takes-strict-stance-summons-dgp-and-sp-on-april-16/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Apr 2026 16:21:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बिहार/झारखंड]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[Jharkhand High Court]]></category>
		<category><![CDATA[top-news]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;बोकारो झारखंड के बोकारो में एक युवती के लापता होने और उसके बाद जंगल से एक महिला का कंकाल मिलने के मामले में पुलिस की लापरवाही को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। इस मामले में अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष जताते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP), बोकारो &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;<strong>बोकारो</strong></p>
<p>झारखंड के बोकारो में एक युवती के लापता होने और उसके बाद जंगल से एक महिला का कंकाल मिलने के मामले में पुलिस की लापरवाही को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। इस मामले में अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष जताते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP), बोकारो SP, फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) के निदेशक और विशेष जांच टीम (SIT) को समन जारी करते हुए 16 अप्रैल को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया है।</p>
<p>यह समन जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने लापता लड़की की मां रेखा देवी की याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया। उनकी 18 वर्षीय बेटी 31 जुलाई 2025 से लापता है। इस संबंध में बोकारो के पिंड्राजोरा थाने में FIR दर्ज कराई गई थी, लेकिन पुलिस द्वारा कोई ठोस कार्रवाई न किए जाने पर लापता लड़की की मां ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।</p>
<p><strong>बिना जांच के पुलिस ने किया बड़ा दावा</strong><br />
इसी बीच हाल ही में बोकारो पुलिस ने जंगल से एक स्त्री का कंकाल बरामद किया और दावा किया कि यह लापता लड़की का हो सकता है। हालांकि याचिकाकर्ता रेखा देवी के वकील ने अदालत को बताया कि बोकारो पुलिस द्वारा बरामद किया गया महिला का कंकाल लापता पीड़िता का नहीं है।</p>
<p><strong>&#039;कंकाल मिलने के बाद भी DNA मिलान नहीं कराया&#039;</strong><br />
इसके बाद न्यायाधीशों ने सरकार से पूछा कि क्या उस कंकाल का रेखा देवी और उनके पति के साथ DNA के साथ मिलान किया गया है। तब ना में जवाब मिलने पर अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि कंकाल के कई दिन पहले ही बरामद हो जाने के बावजूद, कोई DNA टेस्ट नहीं किया गया और न ही कोई सैंपल लिया गया।</p>
<p><strong>HC ने कहा- पूरी प्रक्रिया में की जा रही देरी</strong><br />
अदालत को बताया गया कि इस मामले में दिनेश महतो नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है, जबकि बोकारो के एक जंगल से एक महिला का कंकाल बरामद किया गया है। तो जजों ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर सैंपल पहले ही ले लिया गया होता, तो नतीजा कुछ ही घंटों में पता चल जाता, लेकिन बिना किसी वजह के पूरी प्रक्रिया में देरी की जा रही है।</p>
<p><strong>18 पुलिस कांस्टेबलों को किया गया निलंबित</strong><br />
इसी बीच, बोकारो SP ने इस केस में ड्यूटी के दौरान लापरवाही बरतने के आरोप में पिंडराजोड़ा पुलिस स्टेशन के इंचार्ज सहित 18 पुलिस कांस्टेबलों को निलंबित कर दिया है।</p>
<p>रेखा देवी की 18 साल की बेटी 31 जुलाई, 2025 को लापता हो गई थी, जिसके बाद उन्होंने पिंडराजोड़ा पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज कराई थी। लेकिन बेटी का खोजने के लिए पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई न किए जाने पर, रेखा देवी ने हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की, तब जाकर पुलिस हरकत में आई।</p>
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
					
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