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	<title>mamta &#8211; NewsX 24</title>
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	<title>mamta &#8211; NewsX 24</title>
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		<title>ममता बनर्जी को हाई कोर्ट से बड़ा झटका, ऋतब्रत बने बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 Jun 2026 11:35:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>
		<category><![CDATA[mamta]]></category>
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					<description><![CDATA[कलकत्ता विधानसभा से लेकर संसद तक बगावत झेल रहीं ममता बनर्जी को अब हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने टीएमसी से बागी हुए विधायक ऋतब्रत बनर्जी के विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देने के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इससे पहले पार्टी ने &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कलकत्ता</strong><br />
विधानसभा से लेकर संसद तक बगावत झेल रहीं ममता बनर्जी को अब हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने टीएमसी से बागी हुए विधायक ऋतब्रत बनर्जी के विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देने के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इससे पहले पार्टी ने यहां विधानसभा स्पीकर रथेंद्र बोस के इस फैसले को चुनौती दी थी। ममता खेमे के विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने इस सिलसिले में कलकत्ता हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी।</p>
<p>पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने कोई भी अंतरिम आदेश पास करने से इनकार कर दिया है. हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार स्पीकर का फैसला बरकरार रहेगा. तृणमूल कांग्रेस के नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने नेता प्रतिपक्ष के तौर पर टीएमसी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी की नियुक्ति को चुनौती दी है।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>टीएमसी की तरफ से दो नाम नेता प्रतिपक्ष के लिए गए थे. शोभनदेब चट्टोपाध्याय के नाम का प्रस्ताव टीएमसी नेतृत्व के गुट की तरफ से भेजा गया, जबकि पार्टी के बागी विधायकों के गुट ने ऋतब्रत बनर्जी का नाम भेजा, जिसे पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष रथींद्र बसु ने स्वीकार किया और उन्हें नेता प्रतिपक्ष नियुक्त कर दिया।&nbsp;</p>
<p>कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार (18 जून, 2026) को शोभनदेब चट्टोपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वह स्पीकर के फैसले पर कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं कर रहा है. जस्टिस कृष्ण राव ने सभी पक्षों को विरोध में हलफनामा दाखिल करने और दो हफ्ते में जवाब देने का निर्देश दिया है. अब अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी।&nbsp;</p>
<p>टीएमसी सांसद और सीनियर एडवोकेट कल्याण बनर्जी ने कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश पर कहा कि कोर्ट ने कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया है, लेकिन याचिका स्वीकार कर ली है. अब इस मामले में फाइनल हियरिंग होगी।&nbsp;</p>
<p>मंगलवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्ण राव ने पूछा था कि अगर एक ही राजनीतिक दल की तरफ से दो अलग-अलग नामों का प्रस्ताव भेजा जाए, तब अध्यक्ष का कर्तव्य क्या होगा, क्या वह स्वत: संज्ञान लेते हुए फैसला ले सकते हैं या फिर दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देना आवश्यक होगा. इस पर अध्यक्ष के लिए पेश एडवोकेट बिल्वदल भट्टाचार्य ने दलील दी कि पश्चिम बंगाल विधानसभा परिलब्धियां अधिनियम, 1937 के अनुसार नेता प्रतिपक्ष वही सदस्य होता है जिसे सदन में सबसे अधिक संख्या वाले विपक्षी दल के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त हो।&nbsp;</p>
<p>उन्होंने यह भी कहा था कि अगर किसी दल का संख्याबल या उसके नेता को लेकर कोई विवाद होता है, तो उस मामले में अध्यक्ष का फैसला अंतिम और निर्णायक होगा. उधर, विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर का मामला भी चर्चा में है, जो नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति से ही जुड़ा है. आरोप है कि टीएमसी सांसद और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी की तरफ से नेता प्रतिपक्ष के लिए भेजे गए शोभनदेब चट्टोपाध्याय के नाम के प्रस्ताव पर विधायकों के हस्ताक्षर फर्जी हैं।&nbsp;</p>
<p>इसे लेकर सबसे पहले ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने ही सवाल उठाए और शिकायत की, जिसके बाद मामला गरमा गया. विधायकों की शिकायत के बाद विधानसभा सचिव ने एफआईआर दर्ज कराई, जिसके बाद पश्चिम बंगाल क्राइम इंवेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) ने मामले की औपचारिक जांच शुरू की. जिन विधायकों के नाम विवादित दस्तावेजों पर हैं, उनके बयान दर्ज किए जा रहे हैं और हस्ताक्षरों के नमूने भी लिए जा रहे हैं।&nbsp;</p>
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		<item>
		<title>भवानीपुर चुनाव नतीजे को ममता बनर्जी ने दी कानूनी चुनौती, कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचीं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Jun 2026 13:31:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>
		<category><![CDATA[mamta]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;कोलकाता ममता बनर्जी ने भवानीपुर की हार को कोलकाता हाईकोर्ट में चुनौती दी है. पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज दोपहर अचानक कोलकाता हाई कोर्ट पहुंच गईं और भवानीपुर विधानसभा रिजल्ट के नतीजे को चुनौती दी है. ममता बनर्जी के साथ सांसद डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेना और कल्याण बनर्जी मौजूद थे. रिपोर्ट &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>&nbsp;कोलकाता</strong></p>
<p>ममता बनर्जी ने भवानीपुर की हार को कोलकाता हाईकोर्ट में चुनौती दी है. पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज दोपहर अचानक कोलकाता हाई कोर्ट पहुंच गईं और भवानीपुर विधानसभा रिजल्ट के नतीजे को चुनौती दी है. ममता बनर्जी के साथ सांसद डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेना और कल्याण बनर्जी मौजूद थे. रिपोर्ट के अनुसार ममता याचिका के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने कोर्ट पहुंचीं थीं।&nbsp;</p>
<p>भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच सीधी टक्कर थी. इस सीट से पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने जीत हासिल की है. जबकि ममता को हार का मुंह देखना पड़ा था. कांटे की टक्कर में इस सीट पर शुभेंदु अधिकारी ने इस सीट पर ममता बनर्जी को 15104 वोटों से मात दी थी. इस सीट पर शुभेंदु अधिकारी को 73917 और ममता बनर्जी को 58812 वोट मिले थे. तीसरे स्थान पर रहे सीपीएम के श्रीजीब विश्वास को 3556 वोट मिले थे।&nbsp;</p>
<p>ममता बनर्जी मतगणना के दिन 16-17 राउंड तक आगे ही थीं. लेकिन दोनों उम्मीदवारों के बीच गैप धीरे धीरे कम होता गया. आखिर मतगणना के आखिरी चरणों में शुभेंदु अधिकारी ने तगड़ी लीड ली और आखिरकार 15104 वोट से चुनाव जीत गए।&nbsp;इस सीट पर मतगणना के दौरान काफी हंगामा भी हुआ था।&nbsp;उन्होंने भवानीपुर विधानसभा रिजल्ट के नतीजे को चुनौती दी. ममता बनर्जी के साथ सांसद डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेना और कल्याण बनर्जी भी उपस्थित थे। आपको बता दें कि भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच सीधी टक्कर देखी गई थी. इस सीट से पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी ने जीत हासिल की. वहीं ममता को हार का मुंह देखने को मिला. कांटे की टक्कर में इस सीट पर शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को 15104 वोटों से हराया था।&nbsp;&nbsp;</p>
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		<title>दल-बदल कानून में अटल सरकार का बदलाव भी नहीं बचा पाएगा TMC को? 28 में 20 सांसद बागी खेमे में</title>
		<link>https://newsx24.com/wont-even-the-changes-made-to-the-anti-defection-law-by-the-atal-government-save-the-tmc-20-out-of-28-mps-are-in-the-rebel-camp/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Jun 2026 03:31:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>
		<category><![CDATA[mamta]]></category>
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					<description><![CDATA[कलकत्ता राजनीति का सबसे कड़वा सच है कि सत्ता खिसकते ही सबसे पहले अपने ही साथ छोड़ते हैं और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी इस समय इसी कड़वे सच का सामना कर रही हैं. चुनावी हार के सदमे के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के दो कद्दावर चेहरे काकोली घोष और सुदीप बंदोपाध्याय ने 20 सांसदों &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कलकत्ता</strong></p>
<p>राजनीति का सबसे कड़वा सच है कि सत्ता खिसकते ही सबसे पहले अपने ही साथ छोड़ते हैं और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी इस समय इसी कड़वे सच का सामना कर रही हैं. चुनावी हार के सदमे के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के दो कद्दावर चेहरे काकोली घोष और सुदीप बंदोपाध्याय ने 20 सांसदों के साथ मिलकर बगावत का बिगुल फूंक दिया है. इस बड़ी टूट ने ममता खेमे में हड़कंप मचा दिया है।&nbsp;</p>
<p>अब सवाल सिर्फ पार्टी टूटने का नहीं, बल्कि वजूद का है क्या ये बागी सांसद ममता से उनकी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह भी छीन लेंगे? इस पूरे सियासी ड्रामे के बीच देश का &#039;दलबदल विरोधी कानून&#039; (Anti-Defection Law) क्या ममता की नैया पार लगा पाएगा या बागियों का रास्ता साफ करेगा।&nbsp;</p>
<p><strong>क्या है दलबदल विरोधी कानून ?</strong></p>
<p>हरियाणा में दलबदल का आया राम और गया राम वाला किस्सा जगजाहिर है. 1967 से 1983 के बीच यहां दल-बदल का खूब खेल चला. कांग्रेस से समाजवादी नेता जहां नाता तोड़ अलग हुए, वहीं कांग्रेस ने कई राज्यों में इसका जमकर फायदा उठाया और अपनी सरकार बनाई. ऐसे में देश में &#039;दल बदल निषेध कानून&#039; लाने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जाता है।&nbsp;</p>
<p>इंदिरा गांधी की हत्या के बाद साल 1984 के ऐतिहासिक जनादेश के बाद जब कांग्रेस भारी बहुमत से सत्ता में आई, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देश की राजनीति में &#039;आया राम, गया राम&#039; यानी विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त की बीमारी को जड़ से खत्म करने का फैसला किया. इसी मकसद से साल 1985 में राजीव गांधी सरकार &#039;दलबदल विरोधी कानून&#039; लेकर आई और इसे संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से सफलतापूर्वक पारित कराया गया. इस ऐतिहासिक पहल को 52वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान की 10वीं अनुसूची के रूप में जोड़ा गया, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक स्थिरता और शुचिता लाई जा सके।&nbsp;</p>
<p><strong>अटल सरकार ने दो-तिहाई सदस्यों की लिमिट की&nbsp;</strong><br />
कानून के तहत अगर कोई सांसद या विधायक अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ता है या सदन में अपनी पार्टी के &#039;व्हिप&#039; का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है. इसके अनुसार एक तिहाई विधायक और सांसद अगर दलबदल करते हैं तो फिर उनकी सदस्यता बच सकती है।&nbsp;</p>
<p>दलबदल कानून में सबसे बड़ी कमजोरी या विसंगति यह थी कि व्यक्तिगत स्तर पर दल बदल पर तो रोक लगाई गई, लेकिन नेताओं को थोक में ऐसा करने को कानूनी मान्यता दे दी गई. इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए के शासनकाल 2003 में यह तय किया गया कि सिर्फ एक व्यक्ति ही नहीं, अगर सामूहिक रूप से भी दल बदला जाता है तो उसे भी असंवैधानिक करार दिया जाएगा।&nbsp;</p>
<p>संविधान में 91वां संशोधन कर सदस्यों की संख्या एक तिहाई से बढ़ाकर दो-तिहाई कर दी गई. इसी संशोधन में धारा 3 को पूरी तरह खत्म कर दिया गया, जिसके तहत एक तिहाई पार्टी सदस्यों को लेकर दल बदला जा सकता था. इसके जरिए दल बदल का कानून को रोकने और सख्त बनाने के लिए अटल सरकार ने दो-तिहाई सदस्यों की लिमिट लगाई थी, अब वो भी टूटता नजर आ रहा है।&nbsp;</p>
<p><strong>ममता के केस में गणित</strong><br />
&nbsp;संविधान के मुताबिक अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई (2/3) सांसद या विधायक एक साथ अलग होते हैं, तो उन पर दल बदल कानून लागू नहीं होता. लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 10 सांसद टीएमसी के हैं. लोकसभा सांसदों की कुल संख्या 28 के लिहाज से बागी हुए 20 सांसद हैं, जो दो-तिहाई के आंकड़े को आसानी से छू लिया है. ऐसे में दलबदल कानून ममता बनर्जी के हाथ बांध देगा. इस तरह कानूनन टीएमसी के बागी सांसदों की सदस्यता बची रहेगी।&nbsp;</p>
<p>राजनीतिक गलियारों और हालिया कानूनी बहसों में एक दिलचस्प पेंच सामने आया है. पार्टी से बगावत करने और अलग गुट बनाने के बावजूद तकनीकी और कानूनी रूप से ये बागी सांसदों ने एनसीपीआई में विलय कर दिया है, लेकिन पार्टी के कब्जे और चुनाव निशान पर दावेदारी के लिए जुलाई में स्पीकर से गुहार लगाएंगे. इसके अलावा ममता बनर्जी की पार्टी के बंगाल में 80 से 60 से ज्यादा विधायक अलग गुट बना लिए हैं और अपना नेता भी सदन में चुन लिया है।&nbsp;</p>
<p>महाराष्ट्र के शिंदे और अजित पवार मामलों ने देश को दिखाया है कि दो-तिहाई लिमिट होने के बाद भी दलबदल कानून अब पार्टियों को टूटने से बचाने में &#039;रामबाण&#039; नहीं रहा. दलबदल कानून के तहत फैसला लेने का अंतिम अधिकार सदन के अध्यक्ष के पास होता है. जब तक स्पीकर आखिरी फैसला नहीं लेते, बागी सांसद तकनीकी रूप से सुरक्षित रहते हैं और यह समय उन्हें अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका दे देता है।&nbsp;</p>
<p>दलबदल कानून केवल सांसदों की कुर्सी बचा सकता है, लेकिन पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह किसे मिलेगा इसका पर चुनाव आयोग ही फैसला करता है. काकोली घोष और सुदीप बंदोपाध्याय के गुट के पास दो तिहाई संसदों का समर्थन हासिल है. सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा है कि जब दो-तिहाई सांसदों के साथ अलग होते हैं तो पहले दिन मूल पार्टी पर अपना दावा नहीं कर सकते हैं. इसीलिए एनसीपीआई में विलय का रास्ता चुना. अब आगे की लड़ाई जुलाई में होगी, जब टीएमसी के बागी नेता पार्टी और चुनाव चिन्ह पर दावा जताएंगे?</p>
<p><strong>क्या ममता बनर्जी के हाथ से निकल जाएगी उनकी अपनी पार्टी?</strong><br />
तकनीकी और संवैधानिक रूप से ऐसा होना बिल्कुल मुमकिन है, लेकिन यह डगर इतनी आसान नहीं होगी. पूरी रणनीति के तहत, बागी सांसद सबसे पहले स्पीकर के सामने अपने &#039;विधायी बहुमत&#039; के दम पर खुद को &#039;असली टीएमसी&#039; घोषित करने की मांग करेंगे. इसके बाद यह जंग चुनाव आयोग पहुंचेगी. यदि आयोग के सामने बागी गुट अपना संख्याबल साबित करने में सफल रहा, तो ममता बनर्जी को अपनी ही बनाई पार्टी का नाम और सिंबल गंवाना पड़ सकता है।&nbsp;</p>
<p>इतिहास पर नजर डालें तो हमेशा यही देखा गया है कि जब भी किसी पार्टी में दो गुट बनते हैं तो दोनों ही गुट खुद को &#039;असली पार्टी&#039; बताते हैं ऐसे में फैसला चुनाव आयोग के हाथ में होता है. चुनाव आयोग देखता है कि पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों (सांसदों और विधायकों) में से कितने लोग किस गुट के साथ हैं।&nbsp;</p>
<p>आमतौर पर चुनाव आयोग किसी भी पार्टी के विवाद को सुलझाते समय यह बारीकी से जांचता है कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, केंद्रीय पदाधिकारियों और जिला अध्यक्षों के बीच किसका दबदबा है. अगर संगठन के मोर्चे पर देखा जाए, तो ममता बनर्जी इस समय बेहद मजबूत स्थिति में हैं क्योंकि टीएमसी के कैडर और सांगठनिक ढांचे पर उनकी पकड़ अभी भी बरकरार है. हालांकि, इस मामले का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिवसेना और एनसीपी के हालिया विवादों में चुनाव आयोग ने संगठन के मुकाबले सदन के भीतर सांसदों और विधायकों की संख्या को ज्यादा प्राथमिकता दी थी।&nbsp;</p>
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		<title>बंगाल के बाद तेलंगाना में ‘बड़ा खेला’! 89 लाख वोटरों का मामला सामने, सियासी गलियारों में मचा हड़कंप</title>
		<link>https://newsx24.com/after-bengal-a-major-political-stir-in-telangana-issue-of-89-lakh-voters-comes-to-light-causing-a-commotion-in-political-circles/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Jun 2026 04:02:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[mamta]]></category>
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					<description><![CDATA[हैदराबाद&#160; याद कीजिए पश्चिम बंगाल में जब एसआईआर हुआ तो करीब 70 लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से गायब हो गए. यानी ऐसे वोटर जिनका हकीकत में कोई वजूद ही नहीं था या जो फर्जी थे. नतीजा क्या हुआ? ममता बनर्जी की अजेय मानी जाने वाली सरकार भरभरा कर ढह गई. अब ठीक वैसा &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हैदराबाद&nbsp;</strong></p>
<p>याद कीजिए पश्चिम बंगाल में जब एसआईआर हुआ तो करीब 70 लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से गायब हो गए. यानी ऐसे वोटर जिनका हकीकत में कोई वजूद ही नहीं था या जो फर्जी थे. नतीजा क्या हुआ? ममता बनर्जी की अजेय मानी जाने वाली सरकार भरभरा कर ढह गई. अब ठीक वैसा ही ज&zwj;िन्&zwj;न कांग्रेस के गढ़ तेलंगाना में बाहर आया है. बंगाल में तो फिर भी एसआईआर में लाखों नाम कटे थे, तेलंगाना में तो प्री-एसआईआर यानी शुरुआती जांच में ही 89 लाख फर्जी या गड़बड़ वोटर पाए गए हैं. अगर छंटनी हुई तो तेलंगाना की स&zwj;ियासत में भूचाल आना तय है।&nbsp;</p>
<p><strong>क्या है ये 89 लाख का गड़बड़झाला?</strong><br />
तेलंगाना में पिछले कई महीनों से चुनाव आयोग के अधिकारी एक खास मिशन पर लगे हुए थे. इसे तकनीकी भाषा में प्री-एसआईआर मैपिंग कहा गया. अध&zwj;िकार&zwj;ियों ने साल 2002 की वोटर लिस्ट उठाई और उसे आज की वोटर ल&zwj;िस्&zwj;ट से म&zwj;िलान करवाया. मकसद था ये देखना कि वोटर लिस्ट में जो नाम दर्ज हैं, वो असली हैं या सिर्फ कागजों पर वोट डाल रहे हैं. तेलंगाना के मुख्य निर्वाचन अधिकारी सी. सुदर्शन रेड्डी ने इसकी ड&zwj;िटेल्&zwj;स सामने रखी।&nbsp;</p>
<p>तेलंगाना के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बताया क&zwj;ि वोटर ल&zwj;िस्&zwj;ट में 11 तरह की गड़बड़&zwj;ियां पाई गई हैं. अब तक कुल मिलाकर लगभग 89 लाख गड़बड़&zwj;ियां सामने आ चुकी हैं. मतलब साफ है क&zwj;ि 89 लाख वोटरों के डेटा में कुछ न कुछ ऐसा झोल है, जो सामान्य नहीं है. अब चुनाव आयोग इन सभी संदिग्ध वोटरों को नोटिस थमाएगा और उनसे पूछेगा कि तुम्हारा वजूद क्या है? जरा सबूत तो दिखाओ!</p>
<p><strong>11 गड़बड़&zwj;ियां क&zwj;िस-क&zwj;िस तरह की?</strong><br />
<strong>&nbsp; &nbsp; बाप-बेटे की उम्र में 15 साल से कम का अंतर:</strong> वोटर लिस्ट बता रही है कि कई मामलों में माता-पिता और उनके बच्चों की उम्र के बीच 15 साल से भी कम का अंतर है. यानी, कागज के हिसाब से कोई 13 या 14 साल की उम्र में ही माता-पिता बन गया।&nbsp;</p>
<p><strong>&nbsp; &nbsp; दो भाई-बहनों के बीच 9 महीने से कम का अंतर: </strong>दो बच्चों के जन्म के बीच कम से कम 9 महीने का फासला होता है (जुड़वा बच्चों को छोड़कर). लेकिन तेलंगाना की वोटर लिस्ट में ऐसे हजारों भाई-बहन हैं, जिनके जन्म के बीच 9 महीने से भी कम का गैप है।&nbsp;</p>
<p><strong>&nbsp; &nbsp; बाप-बेटे की उम्र में 50 साल से ज्यादा का अंतर:</strong> एक तरफ 15 साल से कम का अंतर है, तो दूसरी तरफ ऐसे वोटर भी हैं जहां माता-पिता और संतान की उम्र में 50 साल से ज्यादा का फासला दर्ज है।&nbsp;</p>
<p><strong>&nbsp; &nbsp; दादा और पोते की उम्र में 40 साल से कम का अंतर: </strong>दादा और पोते के बीच कम से कम दो पीढ़ियों का फासला होता है. लेकिन यहां वोटर लिस्ट में दादा और पोते की उम्र के बीच 40 साल से भी कम का अंतर है।&nbsp;</p>
<p><strong>&nbsp; &nbsp; रिश्तों का बदल जाना : </strong>सबसे मजेदार झोल ये है कि मौजूदा वोटर लिस्ट और पुरानी लिस्ट का जब मिलान किया गया, तो पता चला कि वोटर का नाम तो वही है, लेकिन उसके रिश्तेदारों के नाम या रिश्ते का प्रकार ही बदल गया है. जो पिछली लिस्ट में पिता था, वो नई लिस्ट में पति बन गया!</p>
<p><strong>अब होगा दूध का दूध-पानी का पानी</strong><br />
सवाल ये कि इन 89 लाख संदिग्धों का क्या होगा? इसके लिए चुनाव आयोग SIR करने जा रहा है. तेलंगाना इससे पहले साल 2002 में एसआईआर हुआ था. यानी 22 साल बाद फिर से वोटर लिस्ट का पूरा पोस्टमार्टम होने जा रहा है।&nbsp;</p>
<p>25 जून से 24 जुलाई के बीच &lsquo;बूथ लेवल ऑफिसर&rsquo; तेलंगाना के हर घर का दरवाजा खटखटाएंगे. वो एक फॉर्म देंगे, उसे भरवाएंगे, चेक करेंगे कि जो वोटर लिस्ट में लिखा है, वो आदमी हकीकत में उस घर में रहता भी है या नहीं. अगर दादा और पोते की उम्र में 30 साल का अंतर है, तो BLO पूछेगा कि ये कौन सा चमत्कार है! अगर जवाब नहीं मिला या वोटर गायब मिला, तो उसका नाम लिस्ट से काट दिया जाएगा।&nbsp;</p>
<p><strong>तेलंगाना का गणित समझ&zwj;िए</strong><br />
तेलंगाना की कुल आबादी लगभग 3.5 से 4 करोड़ के बीच है. यहां कुल वोटरों की संख्या करीब 3 करोड़ 20 लाख के आसपास बैठती है. अब अगर 3.2 करोड़ वोटरों में से 89 लाख वोटर यानी करीब 27-28% वोटर संदिग्ध हैं, तो ये कोई छोटी-मोटी बात नहीं है. अगर इस 89 लाख में से छंटनी के बाद 40 या 50 लाख वोटर भी फर्जी पाए गए और उनके नाम काटे गए, तो पूरा का पूरा चुनावी समीकरण बदल जाएगा।&nbsp;</p>
<p><strong>जीत-हार का मार्जिन</strong><br />
तेलंगाना विधानसभा चुनावों में कई बार हार-जीत का अंतर 2,000 से 5,000 वोटों का होता है. अगर हर विधानसभा क्षेत्र से 30,000 से 40,000 फर्जी वोट कट जाएं, तो उन सीटों पर नतीजे पूरी तरह से पलट सकते हैं।&nbsp;</p>
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		<title>TMC में बड़े बगावत के संकेत! 23 सांसदों के संपर्क में बागी गुट, ममता बनर्जी ने बुलाई अहम बैठक</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Jun 2026 10:33:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>
		<category><![CDATA[mamta]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160;कोलकाता पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद ममता बनर्जी को 15 साल बाद सत्ता गंवानी पड़ी थी. हालिया चुनाव में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को 80 सीटों पर जीत मिली थी. टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों ने पार्टी से निकाले जा चुके संदीपन साहा और &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>&nbsp;कोलकाता</strong><br />
पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद ममता बनर्जी को 15 साल बाद सत्ता गंवानी पड़ी थी. हालिया चुनाव में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को 80 सीटों पर जीत मिली थी. टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों ने पार्टी से निकाले जा चुके संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में बगावत कर दी. बागी गुट ने ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता घोषित कर दिया, जिन्हें स्पीकर ने भी मान्यता दे दी है।&nbsp;</p>
<p>विधायकों के बाद अब सांसदों के भी बगावत करने की चर्चा जोरों पर है. चर्चा है कि टीएमसी के 23 सांसद बागी गुट के संपर्क में हैं. चर्चा 20 सांसदों के केंद्र और सूबे की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में जाने की भी थी. टीएमसी में बगावत के बीच बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी के एक बयान ने सस्पेंस और बढ़ा दिया है. ऋतब्रत बनर्जी ने कहा है कि थोड़ा धैर्य रखिए, बहुत कुछ हो सकता है।&nbsp;</p>
<p>दरअसल, शुक्रवार को कोलकाता में ऋतब्रत बनर्जी से टीएमसी के 20 सांसदों के बीजेपी में शामिल होने की अटकलों को लेकर सवाल पूछा गया था. इस सवाल के जवाब में ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि पिछले सात दिन से मेरी किसी भी सांसद से कोई बात नहीं हुई है. उन्होंने किसी भी सांसद से कोई बात नहीं होने को आधार बनाते हुए कहा कि इसलिए यह नहीं कह सकता कि सांसद क्या कदम उठाएंगे।&nbsp;</p>
<p>पश्चिम बंगाल विधानसभा में बागी गुट की ओर से नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि वर्तमान में जीता हूं. कल क्या होगा, यह कोई नहीं कह सकता. हालांकि, सूत्रों की मानें तो टीएमसी में अगले हफ्ते टूट हो सकती है. 23 सांसद भी बागी गुट के साथ जा सकते हैं. टीएमसी सूत्रों की मानें, तो ये सांसद अभिषेक बनर्जी से नाराज बताए जा रहे हैं. यह सांसद भी विधायकों की तरह अलग गुट बना सकते हैं।&nbsp;</p>
<p>टीएमसी के लोकसभा में 28 सांसद हैं. ऐसे में दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई से बचने के लिए अलग गुट को 19 सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी. कहा जा रहा है कि सांसदों की बगावत का नेतृत्व पार्टी के एक बहुत ही वरिष्ठ सांसद कर रहे हैं. राज्यसभा में टीएमसी के 13 सांसद हैं. राज्यसभा में अलग गुट की मान्यता के लिए नौ सांसदों का समर्थन जरूरी होगा।&nbsp;</p>
<p>दूसरी तरफ, टीएमसी में बगावत के बाद अब ममता बनर्जी भी एक्टिव मोड में आ गई हैं. ममता बनर्जी ने कोलकाता के कालीघाट स्थित अपने आवास पर बड़ी बैठक बुला ली है. यह बैठक 5 जून की शाम चार बजे से शुरू होनी है. ममता बनर्जी के घर इस बैठक में टीएमसी के करीब-करीब सभी बड़े नेताओं को बुलाया गया है।&nbsp;</p>
<p>टीएमसी में सांसदों के भी बगावत करने की सुगबुगाहट और बागी विधायकों के दावे को मान्यता देते हुए स्पीकर की ओर से ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के कमरे की चाबी सौंपे जाने के बाद ममता बनर्जी की यह पहली बड़ी बैठक है. टीएमसी के नाम-निशान को लेकर भी अब कयासों का दौर तेज हो गया है।&nbsp;</p>
<p>ममता बनर्जी के सामने 28 साल पहले बनाई गई अपनी ही पार्टी का नाम और निशान अपने पास बनाए रखने की चुनौती आ खड़ी हुई है. ममता की अगुवाई में होने जा रही इस बैठक में आगे की रणनीति तय पर चर्चा होनी है।&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>ममता के गढ़ में बगावत के संकेत! TMC बैठक से 60 विधायक गायब, पार्टी में मचा हड़कंप</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Jun 2026 10:12:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[mamta]]></category>
		<category><![CDATA[top-news]]></category>
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					<description><![CDATA[कलकत्ता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में सबकुछ ठीक नहीं है। कई विधायक और सांसद नाराज बताए जा रहे हैं। इसको बल रविवार को तब और मिला, जब अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के बाद ममता के घर होने वाली बैठक में 80 में से 60 विधायक &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कलकत्ता</strong></p>
<p>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में सबकुछ ठीक नहीं है। कई विधायक और सांसद नाराज बताए जा रहे हैं। इसको बल रविवार को तब और मिला, जब अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के बाद ममता के घर होने वाली बैठक में 80 में से 60 विधायक पहुंचे ही नहीं। इससे हड़कंप मच गया। सूत्रों के अनुसार, ममता के घर पर रविवार को अहम बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें विधायकों को बुलाया गया था, लेकिन बैठक से 60 विधायक गायब रहे, जिससे उसे रद्द करना पड़ गया। हालांकि, बाद में पार्टी की ओर से सफाई पेश की गई कि अभिषेक और कल्याण बनर्जी पर हुए हमले के मामले में तमाम विधायक व्यस्त थे और यही वजह रही कि वे ममता की बैठक में नहीं पहुंचे।</p>
<p>एनडीटीवी ने टीएमसी के सूत्रों के हवाले से बताया कि यह बैठक पार्टी के विधायक दल के नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने ममता बनर्जी के घर पर बुलाई थी। काफी देर तक विधायकों का इंतजार किया गया, लेकिन जब वे नहीं पहुंचे तो आखिरकार बैठक ही रद्द करनी पड़ी। गैर-हाजिर रहे विधायकों से संपर्क भी नहीं हो पा रहा था। इसकी वजह से भी सवाल खड़े होने लगे हैं कि क्या टीएमसी में बड़ी फूट पड़ने वाली है।</p>
<p>पिछले महीने हुए बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। खुद भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी चुनाव हार गईं। भाजपा ने कुल 208 सीटें जीतीं, जबकि टीएमसी को महज 80 सीटों से संतोष करना पड़ा। इस हार के बाद से ही दबी जुबान में ममता बनर्जी का और टीएमसी की पूर्व सरकार का खुलकर विरोध होने लगा। खुद टीएमसी के कई सांसद और विधायक अपनी ही पार्टी की पूर्व सरकार के खिलाफ आ गए और उसके कई फैसलों का विरोध किया। छह मई को ममता बनर्जी ने हार को लेकर एक बैठक बुलाई, जिसमें लगभग 10 विधायक पहुंचे ही नहीं।</p>
<p><strong>सिर्फ 20 विधायक पहुंचे, गायब हुए 60 नेता हुए &lsquo;नॉट रीचेबल&rsquo;</strong><br />
टीएमसी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, यह महत्वपूर्ण बैठक विधायी दल के नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय द्वारा ममता बनर्जी के कोलकाता स्थित आवास पर बुलाई गई थी. बैठक का मुख्य उद्देश्य चुनावों में मिली हार और अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के बाद की स्थिति की समीक्षा करना था. लेकिन जब बैठक शुरू होने का समय आया, तो वहां केवल 20 विधायक ही मौजूद थे. सूत्रों ने बताया कि जो 60 विधायक बैठक से अनुपस्थित रहे, जब पार्टी नेतृत्व ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की, तो वे सभी पूरी तरह से &lsquo;इनकम्युनिकेटो&rsquo; (संपर्क से बाहर) पाए गए।&nbsp;</p>
<p>इस महा-फियास्को पर पर्दा डालने के लिए टीएमसी के प्रवक्ता कुणाल घोष ने एक कमजोर स्पष्टीकरण देते हुए दावा किया कि जो विधायक बैठक में शामिल नहीं हो सके, वे दरअसल अभिषेक बनर्जी और वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी पर हुए हमलों के बाद विभिन्न इलाकों में विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करने में व्यस्त थे. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में विधायकों का गायब होना महज एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि सुनियोजित दूरी है।&nbsp;</p>
<p><strong>फिर्हाद हकीम और मदन मित्रा दीदी के साथ, लेकिन जमीन खिसकी</strong><br />
कालीघाट में मचे इस आंतरिक हाहाकार के बीच टीएमसी नेतृत्व के लिए एकमात्र क्षणिक राहत की बात यह रही कि पार्टी के कुछ पुराने और दिग्गज क्षत्रप जैसे फिर्हाद हकीम, नयना बंदोपाध्याय, मदन मित्रा, आशिमा पात्रा और कुणाल घोष बैठक में मौजूद रहे. इन कद्दावर नेताओं की उपस्थिति यह दर्शाती है कि वे संकट की इस सबसे काली घड़ी में ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं।&nbsp;</p>
<p>लेकिन यह एकजुटता भी पार्टी के बिखराव को रोकने के लिए नाकाफी साबित हो रही है. यह आंतरिक विद्रोह ठीक उस समय सामने आया है जब महज 24 घंटे के भीतर सोनारपुर में पार्टी के सेकेंड-इन-कमांड अभिषेक बनर्जी को भीड़ द्वारा पीटा गया और हुगली के चंडीतला में वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी के सिर पर हमला किया गया. इन दोनों सिलसिलेवार हमलों को इस बात का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है कि वर्ष 2011 में वामपंथियों को उखाड़कर लगातार तीन बार बंगाल पर राज करने वाली टीएमसी की राजनीतिक जमीन और शासन पर से उसकी लोहे जैसी मजबूत पकड़ अब पूरी तरह ढीली हो चुकी है।&nbsp;</p>
<p><strong>भवानीपुर में सुवेंदु से हार और काकोली घोष का इस्तीफा</strong><br />
कभी खुद को अजेय समझने वाली तृणमूल कांग्रेस इस बार भाजपा के हाथों बेहद बुरी तरह चुनाव हार चुकी है, जो कुछ साल पहले तक राज्य में अपनी जमीन तलाश रही थी. इस शर्मनाक हार ने पार्टी के भीतर गंभीर अंतर्कलह और गुटबाजी को जन्म दे दिया है, जहां अब वरिष्ठ नेता खुलेआम ममता बनर्जी की चुनावी रणनीतियों पर सवाल उठा रहे हैं. सबसे बड़ा आघात तब लगा जब खुद ममता बनर्जी अपने सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के पोस्टर बॉय और वर्तमान मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से चुनाव हार गईं।&nbsp;</p>
<p><strong>कैसे भड़की अंसतोष?</strong><br />
असंतोष की इसी आग में घी डालते हुए पार्टी की वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तदार ने हाल ही में टीएमसी के कार्यकारी अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को एक बेहद गुस्से से भरी चिट्ठी भेजकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. अपनी चिट्ठी में उन्होंने ममता बनर्जी को आड़े हाथों लेते हुए पार्टी को &lsquo;पुराने ढर्रे&rsquo; और जमीनी तौर-तरीकों पर वापस लौटने की नसीहत दी है।&nbsp;</p>
<p>कई अन्य टीएमसी नेताओं ने दबी जुबान में स्वीकार किया है कि पार्टी अपने मूल आधार यानी &lsquo;मां, माटी, मानुष&rsquo; से पूरी तरह भटक चुकी है और ममता बनर्जी सहित शीर्ष नेतृत्व अब आम कार्यकर्ताओं के लिए पूरी तरह &lsquo;इनएक्सेसिबल&rsquo; हो चुका है. हालांकि, पार्टी ने सार्वजनिक रूप से आलोचना करने वाले असंतुष्टों पर नकेल कसने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी का गठन किया है, लेकिन 60 विधायकों की यह खुली बगावत यह साफ बयां कर रही है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है और बंगाल की राजनीति में ममता राज का अंत बेहद करीब है।&nbsp;</p>
<p>हालांकि, पार्टी ने तब भी सफाई दी कि चिंता की कोई बात नहीं है और उन विधायकों ने पहले ही जानकारी दे दी थी। उन्हें उनके अपने क्षेत्रों में फैली अशांति के कारण वहीं रहने को कहा गया था। टीएमसी के कई सांसद जिसमें काकोली घोष भी शामिल हैं, ने भी खुलकर नाराजगी व्यक्त की और बारासात जिला अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने ही पार्टी के सांसद कल्याण बनर्जी के खिलाफ ऐक्शन लेने की भी मांग की। वहीं, हार के तुरंत बाद पार्टी के प्रवक्ता रहे रीजू दत्ता ने भी विरोध करना शुरू कर दिया, जिससे उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निकाल दिया गया। इसके बाद दत्ता ने खुलकर ममता और अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खाल दिया। वहीं, शांतनु सेन, अरूप चकवर्ती ने भी प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया।</p>
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		<title>TMC के 9 दिग्गजों को अपने ही बूथ पर नहीं मिले वोट, चुनाव आयोग की रिपोर्ट से मचा सियासी बवाल</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 May 2026 04:21:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[mamta]]></category>
		<category><![CDATA[top-news]]></category>
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					<description><![CDATA[कलकत्ता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल कर ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कई मजबूत किलों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) द्वारा जारी बूथ स्तर के आंकड़ों से पता चलता है कि टीएमसी के प्रमुख 36 &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कलकत्ता</strong></p>
<p>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल कर ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कई मजबूत किलों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) द्वारा जारी बूथ स्तर के आंकड़ों से पता चलता है कि टीएमसी के प्रमुख 36 नेताओं में से केवल 14 नेता ही अपनी सीट बचा पाए हैं। टीएमसी 22 दिग्गज नेताओं को करारी हार का सामना करना पड़ा है।</p>
<p>हैरान करने वाली बात यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत कई मौजूदा मंत्रियों को अपने ही घरेलू वॉर्डों और उन सीटों पर शिकस्त झेलनी पड़ी है, जिन्हें कभी टीएमसी का अभेद्य गढ़ माना जाता था। 16 वरिष्ठ टीएमसी नेता अपनी सीटों के महज एक-तिहाई या उससे भी कम पोलिंग बूथों पर जीत दर्ज कर सके।</p>
<p><strong>भवानीपुर में शुभेंदु अधिकारी का दबदबा</strong><br />
भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी ने 2021 के उपचुनाव में बड़ी जीत हासिल की थी। वहां इस बार भाजपा के शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें करारी शिकस्त दी। यह लगातार दूसरा विधानसभा चुनाव है जब शुभेंदु ने ममता बनर्जी को पराजित किया है। भवानीपुर के कुल 270 पोलिंग बूथों में से ममता बनर्जी केवल 62 बूथों पर ही बढ़त बना सकीं।</p>
<p>ममता बनर्जी ने अपने घरेलू पोलिंग स्टेशन बूथ संख्या 207 पर 63.33% वोट शेयर के साथ जीत जरूर दर्ज की, लेकिन वह पूरी सीट बचाने के लिए नाकाफी रहा। ममता केवल 54 बूथों पर 50% से अधिक वोट हासिल कर पाईं। शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर के 197 बूथों पर 50% से अधिक वोट शेयर के साथ एकतरफा जीत हासिल की, जिसमें 44 बूथ ऐसे थे जहां उन्हें 80% से अधिक वोट मिले।</p>
<p><strong>3 मंत्रियों को नहीं मिला 15% बूथों पर भी समर्थन</strong><br />
टीएमसी के चार प्रमुख चेहरे और मंत्री सुजीत बोस, ब्रात्य बसु, चंद्रिमा भट्टाचार्य और प्रदीप मजूमदार अपनी सीटों के कुल पोलिंग बूथों में से 15% बूथों पर भी जीत हासिल नहीं कर सके। इन चारों ही मंत्रियों को भाजपा उम्मीदवारों ने बड़े अंतर से हराया। केवल तीन टीएमसी मंत्री मोहम्मद गुलाम रब्बानी, अखरुज्जमां और सबीना यास्मिन ही ऐसे रहे जिन्होंने अपनी सीटों के 80% से अधिक पोलिंग बूथों पर शानदार जीत दर्ज की।</p>
<p><strong>अपने ही घर में घिरे नेता</strong><br />
आंकड़ों के मुताबिक, इन 36 प्रमुख नेताओं में से 25 नेता उसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता के रूप में रजिस्टर्ड थे, जहां से वे चुनाव लड़ रहे थे। इन 25 नेताओं में से केवल 9 नेता अपने घरेलू पोलिंग बूथ पर जीत दर्ज कर सके, जिनमें से 6 अंततः अपनी पूरी सीट हार गए और केवल 3 को ही अंतिम जीत मिली। कुल मिलाकर, अपने घरेलू बूथ पर जीतने वाले 16 वरिष्ठ टीएमसी नेताओं में से सिर्फ 6 ही अपनी विधानसभा सीट जीत पाए।</p>
<p><strong>भाजपा की रणनीति रही सफल</strong><br />
आंकड़े बताते हैं कि टीएमसी के दिग्गजों को बेदखल करने के लिए भाजपा ने बेहद रणनीतिक जीत दर्ज की। जिन 22 सीटों पर टीएमसी के बड़े नेता हारे उनमें से 15 सीटें ऐसी थीं जहां भाजपा ने कुल बूथों के 30% से भी कम हिस्से पर 50% से अधिक वोट शेयर हासिल किया था, फिर भी वे सीट जीतने में कामयाब रहे। भाजपा के सौरव सिकदार ने पूर्व वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य को हरा दिया, जबकि सिकदार केवल 3.78% बूथों पर ही 50% से अधिक वोट शेयर हासिल कर पाए थे।</p>
<p><strong>जीत का बड़ा अंतर</strong><br />
जिन 22 सीटों पर टीएमसी के दिग्गज हारे, उनमें से 16 सीटों पर आधे से अधिक पोलिंग बूथों में भाजपा उम्मीदवार और टीएमसी उम्मीदवार के बीच 10 प्रतिशत से अधिक वोटों का फासला था। दूसरी तरफ, टीएमसी के जो 14 प्रमुख नेता चुनाव जीते हैं उनमें पूर्व विधानसभा अध्यक्ष चंद्रनाथ सिन्हा (बोलपुर) और पुलक रॉय (उलूबेरिया दक्षिण) शामिल हैं। ये दोनों नेता अपनी सीटों के आधे से अधिक बूथों पर भाजपा से 10% से अधिक वोटों से पिछड़ने के बावजूद अंतिम रूप से सीट जीतने में सफल रहे। टीएमसी के लिए सबसे एकतरफा और बड़ी जीत गोलपोखर में मोहम्मद गुलाम रब्बानी और सुजापुर में सबीना यास्मिन की सीटों पर दर्ज की गई।</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>शुभेंदु अधिकारी के निशाने पर ममता की एक और पहचान! कोलकाता स्टेडियम के बाहर तोड़ी गई फुटबॉल मूर्ति</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 May 2026 14:36:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>
		<category><![CDATA[mamta]]></category>
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					<description><![CDATA[कलकत्ता ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल कर सरकार बनाने वाले सीएम शुभेंदु सरकार लगातार बड़े फैसले ले रहे हैं। इसी क्रम में पश्चिम बंगाल में शनिवार को ममता के कार्यकाल में बने एक स्टैच्यू को हटा दिया गया। यह स्टेच्यू साल्ट लेक स्टेडियम के बाहर बनाया गया था। यह फैसला, पश्चिम बंगाल के खेल &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कलकत्ता</strong></p>
<p>ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल कर सरकार बनाने वाले सीएम शुभेंदु सरकार लगातार बड़े फैसले ले रहे हैं। इसी क्रम में पश्चिम बंगाल में शनिवार को ममता के कार्यकाल में बने एक स्टैच्यू को हटा दिया गया। यह स्टेच्यू साल्ट लेक स्टेडियम के बाहर बनाया गया था। यह फैसला, पश्चिम बंगाल के खेल मंत्री निसीथ प्रमाणिक के बयान के बाद आया है। इस बयान में निशीथ ने स्टेडियम में सुविधाओं को बढ़ाने का ऐलान किया था।</p>
<p><strong>खेल मंत्री ने क्या कहा था</strong><br />
इस दौरान प्रमाणिक ने इस स्टैच्यू की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि यह स्टैच्यू दिखने में अच्छा नहीं है। यह बहुत बदसूरत है। कमर के नीचे के दो पैर और उनके ऊपर रखा हुआ फुटबॉल अजीब सा लगता है। शुभेंदु सरकार में खेल मंत्री ने कहाकि यह देखने में भी बिल्कुल भी आकर्षक नहीं लगती, इसलिए हम इस तरह की बेतुकी और अर्थहीन बनावट को यहां नहीं रखेंगे और इसे हटा दिया जाएगा। प्रमाणिक ने कहाकि जब से यह मूर्ति लगी है, पिछली सरकार के बुरे दिन शुरू हो गए । इसके बाद मेस्सी विवाद हुआ और सरकार की सत्ता भी चली गई।</p>
<p><strong>राजनीतिक बयान भी आए सामने</strong><br />
इस मामले पर राजनीतिक बयान भी सामने आए हैं. बीजेपी नेता कीया घोष ने सोशल मीडिया पर लिखा कि स्टेडियम के सामने लगी यह संरचना अब तोड़ दी गई है, जैसा पहले कहा गया था. उनके इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा और तेज हो गई है. दरअसल, कुछ समय पहले पश्चिम बंगाल के खेल मंत्री निशीथ प्रमाणिक ने भी इस प्रतिमा को लेकर बयान दिया था. उन्होंने कहा था कि यह संरचना स्टेडियम की सुंदरता के अनुरूप नहीं है और इसे हटाने की जरूरत है. साथ ही उन्होंने स्टेडियम के इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार की बात भी कही थी।&nbsp;</p>
<p>साल्ट लेक स्टेडियम देश के प्रमुख फुटबॉल मैदानों में से एक है, जहां ईस्ट बंगाल और मोहन बागान जैसे बड़े मुकाबले होते रहे हैं. पिछले साल यहां फुटबॉल स्टार लियोनेल मेसी के कार्यक्रम के दौरान भी भारी भीड़ देखने को मिली थी. यह प्रतिमा साल 2017 में FIFA U-17 वर्ल्ड कप से पहले लगाई गई थी. इसे लेकर शुरुआत से ही अलग-अलग राय बनी हुई थी. कुछ लोग इसे स्टेडियम की पहचान मानते थे, जबकि कुछ इसे असामान्य और विवादित बताते थे. अब इसके तोड़े जाने के बाद कोलकाता में एक बार फिर राजनीतिक और खेल दोनों ही स्तर पर नई बहस शुरू हो गई है।&nbsp;</p>
<p><strong>साल 2017 में हुआ तैयार</strong><br />
आखिर शनिवार को, स्टेडियम के पास होने वाले बदलाव के तहत इस स्टैच्यू को हटा दिया गया। साल्ट लेक स्टेडियम के बाहर यह स्टैच्यू साल 2017 में बनाया गया था। उस साल अंडर-17 फीफा विश्वकप से पहले इसे वीवीआईपी गेट के पास लगाया गया था। इस मूर्ति में फुटबॉल खेलने वाले विशाल पैर दिखाए गए हैं, जो &lsquo;विश्व बांग्ला&rsquo; लोगो में विलीन होते हुए प्रतीत होते हैं और फुटबॉल पर &lsquo;जयी&rsquo; शब्द अंकित है।</p>
<p><strong>खेलमंत्री के कई ऐलान</strong><br />
इसके अलावा खेल मंत्री प्रमाणिक ने विवेकानंद युवा भारती क्रीडांगन के आसपास फूड कोर्ट बनाने से लेकर बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने का भी ऐलान किया। खेलमंत्री ने यह भी कहाकि लियोनेल मेस्सी के दौरे को लेकर हुए विवाद की फिर से जांच की जाएगी और यह सुनिश्चित किया जायेगा कि टिकट धारकों को पैसे वापिस मिलें।</p>
<p>गौरलब है कि भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी को हराकर सरकार बनाई है। शुभेंदु सरकार यहां पर भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बने हैं।</p>
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		<title>ममता बनर्जी को बड़ा झटका, भतीजे के गढ़ में TMC का सूपड़ा साफ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 May 2026 07:52:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[mamta]]></category>
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					<description><![CDATA[कलकत्ता पश्चिम बंगाल के फलता को तृणमूल कांग्रेस का गढ़ कहा जाता था। यह लोकसभा सांसद और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक के संसदीय क्षेत्र में भी आता है। इसकी बड़ी वजह यहां पर जहांगीर खान के प्रभाव को माना जाता था। अब नौबत यह है कि खुद जहांगीर अंत समय में चुनावी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कलकत्ता</strong></p>
<p>पश्चिम बंगाल के फलता को तृणमूल कांग्रेस का गढ़ कहा जाता था। यह लोकसभा सांसद और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक के संसदीय क्षेत्र में भी आता है। इसकी बड़ी वजह यहां पर जहांगीर खान के प्रभाव को माना जाता था। अब नौबत यह है कि खुद जहांगीर अंत समय में चुनावी मैदान छोड़कर चले गए और नतीजा यह हुआ कि टीएमसी पूर्व सीएम बनर्जी के भवानीपुर के बाद एक और गढ़ गंवाने की कगार पर है।</p>
<p><strong>कुछ दिनों में बदले हालात</strong><br />
29 अप्रैल को जब पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण का मतदान होना था, तो उसमें फलता भी शामिल था। उस दौरान क्षेत्र के हर हिस्से में टीएमसी के झंडे और पार्टी कार्यकर्ता मौजूद थे। अब कुछ ही दिनों में स्थिति बदल गई है और अब जगह दूसरे दलों के झंडों से लदी हुई है। टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विधानसभा क्षेत्र में टीएमसी एक झंडा भी नजर नहीं आ रहा था।</p>
<p>वहीं, इस सीट पर बाहुबली छवि वाले जहांगीर खान भी चुनाव से हटने के बाद क्षेत्र से नदारद हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वह गुरुवार को हुए मतदान में भी शामिल नहीं हुए। अखबार से बातचीत में स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें आखिरी बार मंगलवार को देखा गया था। खास बात है कि मंगलवार को ही खान ने चुनाव से हटने का फैसला किया था।</p>
<p><strong>अभिषेक बनर्जी का चलता था सिक्का</strong><br />
जहांगीर खान को डायमंड हार्बर सांसद अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता है। साल 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र से उन्हें 89 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे। अब जब खान ने चुनाव से नाम वापस लिया, तो टीएमसी ने इससे किनारा किया और खान का निजी फैसला बताया।</p>
<p><strong>बंपर वोटिंग हुई</strong><br />
गुरुवार को सीट पर पुनर्मतदान शांतिपूर्ण तरीके से हुआ जहां 86 फीसदी से अधिक लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। इस दौरान केंद्रीय बलों की भारी तैनाती रही। यह पुनर्मतदान 29 अप्रैल के चुनाव से जुड़े विवाद के कारण हुआ, जब कई मतदान केंद्रों से शिकायतें सामने आईं कि ईवीएम पर इत्र जैसे पदार्थ और चिपकने वाली टेप लगाई गई थीं।</p>
<p><strong>भाजपा और लेफ्ट में मुकाबला</strong><br />
खान के हटने के बाद इस सीट पर टीएमसी के पास दावेदारी ही नहीं बची। ऐसे में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी के देबांग्शु पांडा और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के शंभूनाथ कुर्मी के बीच माना जा रहा है। सीट पर कांग्रेस की तरफ से अब्दुर रज्जाक मोल्ला चुनाव लड़ रहे हैं।</p>
<p><strong>भवानीपुर गंवाया</strong><br />
4 मई को जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में ममता बनर्जी के भवानीपुर सीट से हारने की खबर आई। खास बात है कि उन्हें अब बंगाल के मुख्यमंत्री बने शुभेंदु अधिकारी ने ही 15 हजार से ज्यादा मतों से हराया था। इससे पहले वह 2021 के चुनाव में अधिकारी के सामने नंदीग्राम सीट से भी हार का सामना कर चुकी हैं।</p>
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		<title>TMC में बढ़ी अंदरूनी कलह? ममता बनर्जी के सामने ही विधायकों ने उड़ाया अभिषेक का मजाक</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 May 2026 08:12:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[mamta]]></category>
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					<description><![CDATA[कोलकत्ता&#160; तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधायकों की मंगलवार को हुई आंतरिक बैठक में असहमति देखने को मिली। खबर है कि फालता सीट पर 21 मई को फिर से होने वाले चुनाव से पार्टी के उम्मीदवार जहांगीर खान के अचानक नाम वापस लेने से टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं। &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कोलकत्ता&nbsp;</strong><br />
तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधायकों की मंगलवार को हुई आंतरिक बैठक में असहमति देखने को मिली। खबर है कि फालता सीट पर 21 मई को फिर से होने वाले चुनाव से पार्टी के उम्मीदवार जहांगीर खान के अचानक नाम वापस लेने से टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं। सूत्रों के अनुसार, कालीघाट में हुई इस बैठक में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और अभिषेक भी मौजूद थे। बैठक में विधायकों ने फालता में अचानक हुए राजनीतिक उथल-पुथल और पार्टी के संगठनात्मक कामकाज पर सवाल उठाए।</p>
<p>इस घटनाक्रम की वजह जहांगीर खान हैं, जो फालता में राजनीतिक रस्साकशी के स्वघोषित &#039;पुष्पा&#039; हैं। उन्होंने दिन में, फिर से होने वाले चुनाव से अपना नाम वापस लेने की घोषणा करके राज्य के राजनीतिक हलकों को चौंका दिया, जिससे हालिया विधानसभा चुनावों की सबसे विवादित सीटों में से एक पर भाजपा के लिए जीत की राह आसान होती दिख रही है।</p>
<p><strong>जहांगीर खान के खिलाफ TMC ने क्यों नहीं की कार्रवाई?</strong><br />
पार्टी सूत्रों के अनुसार, कोलकाता के दो और हावड़ा के एक विधायक ने जहांगीर के नाम वापस लेने का हवाला देते हुए बैठक में सवाल उठाए। संयोगवश, तीनों विधायक कालीघाट की बैठक में एक ही वाहन से पहुंचे थे। टीएमसी सूत्रों ने बताया कि ये सवाल उठाए गए कि जहांगीर ने मतदान से दो दिन पहले चुनाव से नाम वापस ले लिया, फिर भी उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई।</p>
<p><strong>अभिषेक बनर्जी पर निशाना</strong><br />
कुछ टिप्पणियों को अभिषेक पर परोक्ष रूप से निशाना साधने के रूप में देखा गया, जिनके डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत फालता विधानसभा क्षेत्र आता है। दो वरिष्ठ विधायकों ने जहांगीर को &#039;केंद्रीय प्रशासन वाले क्षेत्र का नेता&#039; कहकर कथित तौर पर व्यंग्य किया, जो यह डायमंड हार्बर क्षेत्र में कड़े नियंत्रण वाले राजनीतिक तंत्र की धारणा पर एक स्पष्ट कटाक्ष था।</p>
<p>यह सवाल भी उठाया गया कि जहांगीर, जिन्हें कथित तौर पर काफी संगठनात्मक समर्थन प्राप्त है और जिनकी प्रभावशाली नेताओं से निकटता है, ने चुनाव से हटने का फैसला क्यों किया। हाल के हफ्तों में फालता सीट का राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है। फालता सीट पर 29 अप्रैल को हुए चुनाव को बाद में रद्द कर दिया गया और दोबारा चुनाव कराने की घोषणा की गई थी।</p>
<p><strong>श्मशान घाट के मुद्दे पर तंज</strong><br />
हालिया चुनाव से पहले, प्रचार के दौरान अभिषेक ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि जहांगीर ने उनसे इलाके में श्मशान घाट बनवाने का अनुरोध किया है। बाद में उन्होंने टिप्पणी की कि 4 मई को विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद, &#039;दिल का दौरा पड़ने से मरने वालों&#039; का वहां अंतिम संस्कार किया जा सकेगा। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने बताया कि मंगलवार की चर्चा के दौरान यह विवादास्पद टिप्पणी फिर से सामने आई और विधायकों ने कथित तौर पर पूछा कि अब श्मशान घाट कौन बनवाएगा और किसके लिए बनवाएगा।</p>
<p>टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं ने इन टिप्पणियों को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए ऐसे समय में एक व्यापक संदेश के रूप में देखा है, जब संगठन के कुछ वर्ग निजी तौर पर चुनाव के बाद की रणनीति पर चर्चा कर रहे हैं। अभिषेक की हालिया राजनीतिक उपस्थिति को लेकर उठ रहे सवालों के मद्देनजर भी इस चर्चा का महत्व बढ़ गया।</p>
<p>चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद से ममता बनर्जी सार्वजनिक रूप से सक्रिय रही हैं &#8211; कार्यक्रमों में भाग लेती रहीं और चुनाव बाद हुई हिंसा के मुद्दों पर अदालतों का रुख किया। जबकि, अभिषेक अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहे और फालता विधानसभा सीट उनके संसदीय क्षेत्र में आने के बावजूद चुनाव प्रचार के दौरान प्रमुखता से नजर नहीं आए।.</p>
<p><strong>ये विधायक हुए नाराज</strong><br />
टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, कुणाल घोष, रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा ने पार्टी नेतृत्व की खुलकर आलोचना की है। यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ है, जब भारत निर्वाचन आयोग की तरफ से डेटा सामने आया है, जिसमें कहा गया है कि ममता बनर्जी भवानीपुर सीट के 267 में 207 बूथों पर पीछे चल रहीं थीं। यहां उन्हें शुभेंदु अधिकारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था।</p>
<p><strong>अभिषेक बनर्जी पर हुए नाराज</strong><br />
सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया कि तीनों विधायकों ने आरोप लगाए हैं कि सांसद अभिषेक बनर्जी के फैसले पार्टी पर थोपे गए थे, जिसके चलते पार्टी को झटका लगा। साथ ही फालता से जहांगीर खान के नामांकन वापस लेने पर भी तंज कसा गया।</p>
<p><strong>क्या था रिएक्शन</strong><br />
रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने कहा, &#039;बुआ और भतीजे की जोड़ी को समझ ही नहीं आया कि उनके साथ अचानक यह क्या हो गया। वे दोनों बिल्कुल चुपचाप बैठे सुनते रहे। उनके चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा था, लेकिन वे कुछ बोले नहीं।&#039; उन्होंने बताया ठीक इसके पहले ही पार्टी प्रमुख ने दावा किया था कि भाजपा भविष्य में केंद्र से चली जाएगी।</p>
<p>अखबार से बातचीत में एक सूत्र ने कहा, &#039;कुणाल ने खुलकर कहा कि अब बहुत हो गया है और खुलकर बोलने की आजादी मांगी। उन्होंने कहा कि उनके कालीघाट वाले घर पर ऐसी बहुत सी बैठकें हो चुकी हैं, अब हमें उन बैठकों को छोड़कर सड़कों पर उतरना चाहिए ताकि बीजेपी की इस बुलडोजर आर्मी से गरीब और बेबस लोगों को बचाया जा सके।&#039;</p>
<p><strong>लगातार दूसरी बार हारी हैं ममता बनर्जी</strong><br />
साल 2021 में ममता बनर्जी को नंदीग्राम सीट से हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि, टीएमसी ने राज्य में 200 से ज्यादी सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बरकरार रखने में सफलता हासिल की थी। वहीं, 2026 में उन्हें दोहरा झटका लगा। एक ओर जहां उन्होंने भवानीपुर सीट शुभेंदु अधिकारी के हाथों गंवाई। जबकि, टीएमसी भी महज 80 सीटें ही जीत सकी। भाजपा ने अधिकारी को मुख्यमंत्री बनाया।</p>
<p><strong>15 विधायक गायब</strong><br />
बैठक में विधायकों की उपस्थिति को लेकर भी चिंता जताई गई। पार्टी सूत्रों के अनुसार, लगभग 15 विधायक अनुपस्थित थे।कई विधायकों ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया, वहीं मालदा के एक विधायक ने नेतृत्व को कथित तौर पर सूचित किया कि वह काम के सिलसिले में दिल्ली में हैं। इससे राजनीतिक हलकों में उनके संभावित भावी कदम को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं, हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई।</p>
<p><strong>LoP पर क्या हुआ फैसला</strong><br />
वहीं बैठक में बॉलीगंज के विधायक शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देने से संबंधित प्रक्रियात्मक मुद्दों पर भी चर्चा हुई। सूत्रों ने बताया कि विधायकों ने उन्हें नामित करने के समर्थन में एक पत्र पर हस्ताक्षर किए।</p>
<p>कोलकाता में अभिषेक की कुछ संपत्तियों के संबंध में जारी किए गए नगर निगम नोटिस पर उनके द्वारा कड़ा विरोध जताने के कुछ घंटों बाद यह बैठक हुई। विधायकों की बैठक में, उन्होंने कहा कि न तो नोटिस और न ही धमकियां उन्हें झुका पाएंगी।</p>
<p>बैठक में मौजूद एक टीएमसी विधायक ने अभिषेक के हवाले से कहा, &#039;वे मेरा घर गिरा दें, वे नोटिस भेजें। मैं अपना सिर नहीं झुकाऊंगा। चाहे कुछ भी हो जाए, भाजपा के खिलाफ मेरी लड़ाई जारी रहेगी।&#039;</p>
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