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		<title>प्रदेश में महंगी होंगी दवाएं, मिडिल ईस्ट संकट का असर मेडिकल किट पर</title>
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		<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 03:32:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मध्य प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>
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					<description><![CDATA[भोपाल&#160; &#160;मिडिल ईस्ट में वार का अंजाम ये हुआ है कि अब महंगाई ने आम जिंदगी में मुश्किलें बढ़ा दी हैं। होटल-रेस्टोरेंट्स में खाना महंगा हो गया, यहां तक कि आम भारतीय की पहली पसंद समोसा-कचोरी और चाट तक के पैसे बढ़ गए। 10 रुपए का समोसा 20 का मिलने लगा। गैस संकट ने हर &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>भोपाल&nbsp;</strong></p>
<p>&nbsp;मिडिल ईस्ट में वार का अंजाम ये हुआ है कि अब महंगाई ने आम जिंदगी में मुश्किलें बढ़ा दी हैं। होटल-रेस्टोरेंट्स में खाना महंगा हो गया, यहां तक कि आम भारतीय की पहली पसंद समोसा-कचोरी और चाट तक के पैसे बढ़ गए। 10 रुपए का समोसा 20 का मिलने लगा। गैस संकट ने हर परिवार का खर्च दोगुना कर दिया। वहीं अब ताजा खबर ये है कि आपदा में अवसर चीन ने भी खोज लिया। इसका बड़ा असर ये होने जा रहा है कि अब आपकी मेडिकल किट भी आपकी जेब पर बोझ बढ़ाने वाली है।</p>
<p><strong>युद्ध से ग्लोबल सप्लाई हुई प्रभावित</strong><br />
दरअसल ईरान-इजरायल युद्ध के कारण ग्लोबल सप्लाई प्रभावित हुई है। इसके कारण दवाओं का कच्चा माल 166 फीसदी तक महंगा हो गया है। अगर यह तनाव लंबा खिंचा, तो बाजार में दवाओं की कीमतें 25 से 30 फीसदी तक बढ़ सकती है। दवाएं महंगी होने से सबसे ज्यादा वे मरीज परेशान होंगे जो बीपी, शुगर और अस्थमा जैसी बीमारियों के लिए हर दिन दवाएं खाते हैं।</p>
<p><strong>मध्य प्रदेश की 200 से ज्यादा फार्मा कंपनियां चीन पर निर्भर</strong><br />
मध्य प्रदेश की छोटी-बड़ी 200 से ज्यादा फार्मा कंपनियां कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर हैं। युद्ध के कारण शंघाई पोर्ट मुंबई तक आने वाले जहाजों को अब सुरक्षित रास्तों के चक्कर में 30-40 की जगह 80-90 दिन लग रहे हैं। शिपिंग लागत 15 रुपए से बढ़कर 40 रुपए प्रति किलो पहुंच गई है। कारोबारियों का दावा है कि लागत दोगुनी होने के कारण कीमतों में इजाफा करना पड़ेगा।</p>
<p><strong>जेनेरिक दवाओं और केमिस्ट शॉप्स पर डिस्काउंट बंद</strong><br />
दवा बाजार के एक्सपर्ट्स बताते हैं कि सबसे पहला असर जेनेरिक दवाओं और केमिस्ट की दुकानों पर मिलने वाले डिस्काउंट पर पड़ा है। जो दवाएं अब तक 10-20 फीसदी की छूट पर मिल रही थीं। अब वे एमआरपी पर ही बिक रही हैं। आने वाले 15-20 दिन में एथिकल यानी ब्रांडेड और सर्जिकल सामान भी महंगा होने के आसार हैं।</p>
<p><strong>देशभर में तैयारी शुरू</strong><br />
बेसिक ड्रग डीलर्स एसोसिएशन के मुताबिक कच्चे माल की कमी के कारण और बढ़ते माल भाड़े के कारण उद्योग को प्रभावित किया है। केमिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष जितेंद्र धाकड़ के मुताबिक देश भर में इसकी तैयारी शुरू हो चुकी है। अगले 15-20 दिन में इसका असर दिखने लगेगा। रोज दवा लेने के वाले मरीजों पर असर ज्यादा होगा।</p>
<p><strong>जिन परिवारों में बुजुर्ग, उनकी जेब पर दोगुना असर</strong><br />
जिन परिवारों में दो बुजुर्गों का मासिक खर्च यदि 3000 रुपए है, तो डिस्काउंट खत्म होने और दवाओं के नए रेट बढ़ने के बाद यह 3800 तक पहुंच सकता है। कच्चा माल महंगा होने पर टेंडर वाली छोटी कंपनियां सप्लाई से पीछे हट सकती हैं। इससे सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवाओं में कमी की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।</p>
<p><strong>बुखार, खांसी की दवाओं का कच्चा 155 फीसदी महंगा!</strong><br />
पैरासिटामोल बुखार की दवा है, पहले इसके कच्चे माल की कीमत 225 रुपए प्रति किलोग्राम थी, जो अब बढ़कर 575 हो जाएगी। वहीं कफ सीरप प्रोपलीन ग्लाइकोल 150 रुपए प्रति किलोग्राम से बढ़कर 400 रुपए हो गया है। इंफेक्शन के लिए दी जाने वाली एजिथ्रोमाइसिन का सामान 11,000 रुपए प्रति किलोग्राम से बढ़कर 14,500 रुपए तक महंगा हुआ है। आईब्रुफेन जैसी दर्द निवारक दवाई बनाने के लिए कच्चे माल की कीमतें 600 रुपए से बढ़कर 900 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई हैं। वहीं एंटीबायोटिक सिफेक्सिन का सामान 8500 से बढ़कर 11000 रुपए प्रति किलोग्राम तक महंगा हुआ है। इसका असर अब इनकी दवाओं पर दिखेगा और ये दवाएं भी महंगी हो सकती हैं।&nbsp;</p>
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		<title>फूल भी करते हैं दवा का काम, इन रोगों में ये हैं रामबाण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Mar 2026 14:07:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लाइफ्स्टाइल]]></category>
		<category><![CDATA[Flowers]]></category>
		<category><![CDATA[medicine]]></category>
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					<description><![CDATA[फूलों की खूशबू और उनकी सुंदरता तो हम सभी का मन मोह लेती है, लेकिन क्या आप जानते है कि हम फूलों को भी खा सकते हैं। खाने में फूलों का उपयोग भले ही हम सीधे न कर पाएं, लेकिन सही पर फूलों का इस्तेमाल हम कई चीजें में करते हैं, फिर चाहे वह खाना &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>फूलों की खूशबू और उनकी सुंदरता तो हम सभी का मन मोह लेती है, लेकिन क्या आप जानते है कि हम फूलों को भी खा सकते हैं। खाने में फूलों का उपयोग भले ही हम सीधे न कर पाएं, लेकिन सही पर फूलों का इस्तेमाल हम कई चीजें में करते हैं, फिर चाहे वह खाना हो या सलाद।</p>
<p>हजारो सालों से हम फूलों कि सुंदरता को देखते और महक का आनंद लेते आए हैं। उनके इन्हीं रंगों में उनकी बहुत सारी खूबियां छिपी हुई हैं। अभी तक अधिकांश लोग यही जानते थे कि फूलों का उपयोग सिर्फ इत्र बनाने में होता है,तो आइए जाने कुछ ऐसे ही फूलों को जो हमारे भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं।</p>
<p>लैवेंडर फूल-इन खुशबूदार फूलों का इस्तेमाल आइस्क्रीम और दही में किया जाता है। इसका इस्तेमाल एंटीसेप्टिक और बालों की रूसी को रोकने में भी होता है।</p>
<p>गुलदाउदी-कैमोमाइल की तरह ही गुलदाउदी का चाय में इस्तेमाल होता है। गुलदाउदी में एंटी ऑक्सीडेंट और मिनरल्स के अलावा एंटी इन्फ्लेमेटरी, एंटी-कार्सनोजेनिक गुण भी पाए जाते हैं।</p>
<p>बबूने का फूल (कैमोमाइल)-यह फूल आपको शान्त रखने में मदद करता है, इसीलिए इसका इस्तेमाल चाय में किया जाते है। इसमें एंटीइनफ्लेमेटरी, एंटी-कार्सनोजेनिक और घाव भरने के गुण पाए जाते हैं।</p>
<p>गुडहल के फूल-इन फूलों का इस्तेमाल सलाद को गार्निश करने के लिए होता है, इसके अलावा चाय में भी गुड़हल के फूलों का इस्तेमाल होता है। इनमें भरपूर मात्रा में एंटी-आक्सीडेंट पाए जाते हैं जो लो-ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करते हैं।</p>
<p>एप्पल और ऑरेंज के फूल-ये दोनों फूल सबसे ज्यादा खाए जाते हैं, इन्हें खाने से कई रोग दूर होते हैं। इसके बारे में कुछ ही लोग जानते हैं, लेकिन इनका उपयोग कम मात्रा में करना चाहिए।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>पेटेंट हटने से होगा बड़ा बदलाव, ₹16,000 की दवा अब मिलेगी सिर्फ ₹1,500 में</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Mar 2026 12:31:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[featured]]></category>
		<category><![CDATA[medicine]]></category>
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					<description><![CDATA[नई दिल्&#8205;ली &#160;डेनमार्क की दिग्गज दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क (Novo Nordisk) के साल्ट &#8216;सेमाग्लूटाइड&#8217; (Semaglutide) पर पेटेंट इसी सप्&#8205;ताह समाप्&#8205;त हो जाएगा. कंपनी द्वारा इसी सॉल्&#8205;ट का इस्&#8205;तेमाल कर वजन घटाने के लिए &#8216;ओजेम्पिक&#8217; और डायबिटीज नियंत्रण के लिए &#8216;वेगोवी&#8217; नामक दवा बनाई जाती हैं. पेटेंट की वजह से ये दोनों ही दवाएं काफी महंगी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्&zwj;ली</strong></p>
<p>&nbsp;डेनमार्क की दिग्गज दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क (Novo Nordisk) के साल्ट &lsquo;सेमाग्लूटाइड&rsquo; (Semaglutide) पर पेटेंट इसी सप्&zwj;ताह समाप्&zwj;त हो जाएगा. कंपनी द्वारा इसी सॉल्&zwj;ट का इस्&zwj;तेमाल कर वजन घटाने के लिए &lsquo;ओजेम्पिक&rsquo; और डायबिटीज नियंत्रण के लिए &lsquo;वेगोवी&rsquo; नामक दवा बनाई जाती हैं. पेटेंट की वजह से ये दोनों ही दवाएं काफी महंगी है. लेकिन, पेटेंट समाप्ति के बाद अन्&zwj;य कंपनियां भी सेमाग्&zwj;लूटाइड का इस्&zwj;तेमाल कर वजन घटाने और डायबिटीज की जेनेरिक दवाएं बना सकेंगी. इससे आम आदमी को सस्&zwj;ती दवाएं मिलने लगेंगी।&nbsp;</p>
<p>वर्तमान में नोवो नॉर्डिस्क की वजन घटाने वाली दवा ओजेम्पिक की मासिक खुराक की कीमत करीब 8000 से 11,000 रुपये तक पड़ती है. डायबिटीज दवा वेगावी का महीने का खर्च 16400 रुपये तक होता है. कीमत ज्&zwj;यादा होने की वजह से यह आम आदमी की पहुंच से बाहर है. दवा बाजार जानकारों का कहना है कि जेनेरिक दवा इससे करीब 60 फीसदी तक सस्&zwj;ती होगी. शुरुआती दौर में जेनेरिक दवाओं की मासिक कीमत 3,000 से 5,000 रुपये के बीच रह सकती है, लेकिन जैसे-जैसे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी यह और गिरकर 1,500 से 2,500 रुपये तक आ सकती है।&nbsp;</p>
<p><strong>मोटापे और डायबिटीज के करोड़ों मरीज</strong><br />
चीन के बाद डायबिटीज मरीजों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या भारत में ही है. वहीं, लैंसेट की रिपोर्ट के मुताबिक, 2050 तक भारत में 44 करोड़ से अधिक लोग मोटापे का शिकार हो सकते हैं. फार्मारैक के अनुमान के मुताबिक, भारत का मोटापा-रोधी दवा बाजार 2030 तक 80 अरब रुपये तक पहुंच सकता है, जो वर्तमान में करीब 15 अरब रुपये है. सस्ती दवाओं की उपलब्धता से निम्न और मध्यम आय वर्ग के मरीज भी अब वैज्ञानिक तरीके से वजन घटाने का उपचार ले सकेंगे. यह कदम भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गेम-चेंजर साबित होगा।&nbsp;</p>
<p><strong>50 से ज्यादा ब्रांड्स दवा बनाने को तैयार</strong><br />
नोवो नॉर्डिस्क का पेटेंट खत्&zwj;म होने का असर है कि सन फार्मा (Sun Pharma), मैनकाइंड फार्मा (Mankind Pharma), डॉ. रेड्डीज (Dr. Reddy&rsquo;s), जायडस (Zydus), ल्यूपिन (Lupin) और अल्केम (Alkem) जैसी 40 से अधिक कंपनियां अगले कुछ हफ्तों में सेमाग्लूटाइड के 50 से ज्यादा जेनेरिक संस्करण लॉन्च करने वाली हैं. कुछ कंपनियां तो इतनी तैयार हैं कि पेटेंट खत्म होने के अगले ही दिन अपने उत्पाद बाजार में उतार देंगी. इससे न केवल प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, बल्कि मरीजों के पास चयन के लिए कई विश्वसनीय विकल्प भी मौजूद होंगे।&nbsp;</p>
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