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	<title>Spirituality &#8211; NewsX 24</title>
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		<title>मई महीने की शुरुआत और अंत दोनों पूर्णिमा से, बना दुर्लभ धार्मिक संयोग</title>
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		<pubDate>Fri, 01 May 2026 07:08:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[&#160;आज से मई का महीना शुरू हो चुका है. ज्योतिषियों के मुताबिक, मई का महीना धार्मिक नजरिए से बेहद खास माना जा रहा है. दरअसल, मई में एक अनोखा संयोग बन रहा है, जहां महीने की शुरुआत और समापन दोनों ही पूर्णिमा से होगा. ऐसे योग बहुत कम देखने को मिलते हैं, इसलिए इस पूरे &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;आज से मई का महीना शुरू हो चुका है. ज्योतिषियों के मुताबिक, मई का महीना धार्मिक नजरिए से बेहद खास माना जा रहा है. दरअसल, मई में एक अनोखा संयोग बन रहा है, जहां महीने की शुरुआत और समापन दोनों ही पूर्णिमा से होगा. ऐसे योग बहुत कम देखने को मिलते हैं, इसलिए इस पूरे महीने को पूजा-पाठ, स्नान और दान के लिए अत्यंत शुभ माना जा रहा है. इस दिन पूरे महीने श्रीहरि और मां लक्ष्मी की पूजा करें और मनोकामना पूर्ति के लिए उनके आगे तेल का दीपक भी जलाएं.</p>
<p><strong>पूर्णिमा से होगी महीने की शुरुआत</strong><br />
मई की शुरुआत 1 तारीख को वैशाख पूर्णिमा से हो रही है, जिसे बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है. यह दिन हिंदू और बौद्ध दोनों धर्मों में बहुत पवित्र माना जाता है. इस दिन लोग सुबह स्नान करके पूजा करते हैं और जरूरतमंदों को दान देते हैं. मान्यता है कि इस दिन किए गए अच्छे कार्यों का फल कई गुना बढ़ जाता है.</p>
<p><strong>बुद्ध पूर्णिमा का खास महत्व</strong><br />
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और जल दान करना बहुत शुभ होता है. वहीं बौद्ध धर्म में यह तिथि इसलिए खास है क्योंकि इसी दिन भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण हुआ था. इसलिए यह दिन आध्यात्म और साधना के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है.</p>
<p><strong>महीने का अंत भी होगा पूर्णिमा पर</strong><br />
दिलचस्प बात यह है कि मई का आखिरी दिन यानी 31 मई को भी पूर्णिमा तिथि पड़ेगी. यह ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा होगी, जो अपने आप में बहुत विशेष मानी जाती है. अधिक मास में आने के कारण इसका महत्व और भी बढ़ जाता है.</p>
<p><strong>अधिक पूर्णिमा क्यों मानी जाती है खास?</strong><br />
अधिकमास करीब ढाई से तीन साल में एक बार आता है और इस दौरान आने वाली पूर्णिमा को बहुत पुण्यदायक माना जाता है. इसे पुरुषोत्तम मास की पूर्णिमा भी कहा जाता है. इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से सुख-समृद्धि और शांति मिलने की मान्यता है.</p>
<p><strong>शास्त्रों में महत्व</strong><br />
धार्मिक ग्रंथों में इस पूर्णिमा को बहुत फलदायी बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन किए गए व्रत, पूजा और दान से व्यक्ति को सफलता और सकारात्मक परिणाम मिलते हैं. इसे &lsquo;सर्व सिद्धिदायिनी&rsquo; तिथि भी कहा जाता है.</p>
<p><strong>इन कामों को करना रहेगा शुभ</strong><br />
इस पूरे महीने में खासतौर पर पूर्णिमा के दिन व्रत रखना, भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करना और सत्यनारायण कथा सुनना लाभकारी माना जा रहा है. इसके अलावा गंगा, यमुना या किसी पवित्र नदी में स्नान करके अन्न, कपड़े और धन का दान करना भी बहुत शुभ माना गया है.</p>
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		<title>भगवान शिव कैसे बने अर्द्धनारीश्वर, माता सिद्धिदात्री की कृपा और अष्ट सिद्धियों से जुड़ी है यह अद्भुत कथा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Apr 2026 15:27:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[Spirituality]]></category>
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					<description><![CDATA[भगवान शिव देवे के देव कहलाते हैं। आज हम आपको महादेव के अर्द्धनारीश्वर रूप से जुड़ी एक कथा बताने जा रहे हैं &#160;भगवान शिव का &#039;अर्द्धनारीश्वर&#039; स्वरूप विशेष महत्व रखता है। साथ ही भगवान शिव का यह स्वरूप प्रेरणा भी देते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि भगवान शिव ने किस देवी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>भगवान शिव देवे के देव कहलाते हैं। आज हम आपको महादेव के अर्द्धनारीश्वर रूप से जुड़ी एक कथा बताने जा रहे हैं</p>
<p>&nbsp;भगवान शिव का &#039;अर्द्धनारीश्वर&#039; स्वरूप विशेष महत्व रखता है। साथ ही भगवान शिव का यह स्वरूप प्रेरणा भी देते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि भगवान शिव ने किस देवी से सिद्धियां प्राप्त की और वह कैसे अर्द्धनारीश्वर कहलताए।</p>
<p><strong>इसलिए कहलताए &#039;अर्द्धनारीश्वर&#039;</strong><br />
भगवान शिव को सभी आठ सिद्धियां माता सिद्धिदात्री की आराधना से प्राप्त हुई हैं। सिद्धिदात्री का है अर्थ सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली। माता सिद्धिदात्री, मां दुर्गा का नौवां रूप हैं। मार्कण्डेयपुराण के अनुसार, आठ सिद्धियां अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व हैं।</p>
<p>देवीपुराण में इस बात का वर्णन मिलता है कि भगवान शिव ने माता सिद्धिदात्री की कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था और उनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हो गया था, जिस कारण वह &#039;अर्द्धनारीश्वर&#039; कहलाए।</p>
<p><strong>देवी सिद्धिदात्री का स्वरूप &#8211;</strong><br />
&nbsp;मां सिद्धिदात्री कमल पर विराजमान रहती हैं। लाल साड़ी में अत्यंत शांत और सौम्य दिखती हैं। इनकी चार भुजाएं हैं, जिसमें उन्होंने सुदर्शन चक्र, शंख, गदा और कमल धारण किया हुआ है। देवी सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है। माना जाता है कि देवी सिद्धिदात्री की आराधना से अष्ट सिद्धि, नव निधि, ज्ञान, और सभी प्रकार की सांसारिक व आध्यात्मिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं।</p>
<p>&nbsp;&nbsp;&nbsp; अणिमा &#8211; अपने शरीर को अत्यंत सूक्ष्म या परमाणु के बराबर छोटा कर लेने की शक्ति।<br />
&nbsp;&nbsp;&nbsp; महिमा &#8211; अपने शरीर को विशाल या ब्रह्मांड जितना बड़ा कर लेने की क्षमता।<br />
&nbsp;&nbsp;&nbsp; गरिमा &#8211; शरीर का भार अनंत गुना तक बढ़ा लेने की शक्ति, जिसे कोई हिला न सके।<br />
&nbsp;&nbsp;&nbsp; लघिमा &#8211; शरीर को रुई से भी हल्का कर लेने की शक्ति।<br />
&nbsp;&nbsp;&nbsp; प्राप्ति &#8211; किसी भी वस्तु को तुरंत प्राप्त कर लेना या कहीं भी पहुंच जाने की क्षमता।<br />
&nbsp;&nbsp;&nbsp; प्राकाम्य &#8211; किसी भी इच्छा को तुरंत पूरा कर लेने की क्षमता।<br />
&nbsp;&nbsp;&nbsp; ईशित्व &#8211; यह दिव्य शक्तियां होती हैं, जिससे प्रकृति पर नियंत्रण किया जा सकता है।<br />
&nbsp;&nbsp;&nbsp; वशित्व &#8211; सभी जीवों या इंद्रियों को अपने वश में रखने की क्षमता।</p>
<p><strong>क्या दर्शाता है अर्द्धनारीश्वर स्वरूप</strong><br />
भगवान शिव के अर्द्धनारीश्वर में उनका आधा भाग पुरुष रुपी शिव का वास है, तो वहीं, आधे हिस्से में स्त्री रुपी शिवा यानि शक्ति का वास है। यह स्वरूप दर्शाता है कि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं।</p>
<p>साथ ही अर्द्धनारीश्वर रूप भगवान शिव पुरुष (चेतना) और पार्वती स्त्री (ऊर्जा/शक्ति) का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में भगवान शिव के इस स्वरूप से यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि स्त्री और पुरुष दोनों ही एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं और दोनों का सम्मान जरूरी है।</p>
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