बिहार की राजनीति में फिर हलचल?, सम्राट चौधरी के बढ़ते असर पर नीतीश कुमार की पैनी नजर

पटना.
बिहार की राजनीति इन दिनों तेजी से बदलते घटनाक्रमों और अंदरखाने चल रही सियासी हलचलों के कारण चर्चा के केंद्र में है। विधान परिषद चुनाव से पहले सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी रणनीतियों को धार देने में जुटे हैं। बयानबाजी का सिलसिला भी जारी है।
एक ओर पूर्व सीएम नीतीश कुमार लगातार सक्रिय होकर राजनीतिक संदेश दे रहे हैं, तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा दिल्ली में हैं। दिल्ली में चिराग पासवान, गिरिराज सिंह समेत बिहार के कई नेताओं से सीएम की मुलाकात हुई है। इसके अलावा विजय सिन्हा की भी कई नेताओं से मुलाकात की तस्वीरें सामने आई हैं। इधर, विपक्ष में भी नई हलचल दिखाई दे रही है। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव फैमिली में तेजस्वी के बेटे इराज के बर्थडे की पार्टी में एक फिर एकजुटता दिखाई दी है। इसके अलावा दूसरी ओर राजद संगठन में बदलाव की चर्चाओं ने बिहार की सियासत को और गर्म कर दिया है।
सत्ता के भीतर क्या बदल रहा है?
हाल के दिनों में हुए घटनाक्रमों ने सबसे ज्यादा ध्यान एनडीए के भीतर के समीकरणों पर खींचा है। मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद भी नीतीश कुमार लगातार संगठन और सरकार दोनों पर नजर बनाए हुए हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा तब और तेज हो गई, जब नीतीश कुमार अचानक उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी के आवास पहुंच गए। बताया जाता है कि इस दौरान उन्होंने सरकार और कैबिनेट के कामकाज को लेकर विस्तार से चर्चा की। जाते समय उनका यह कहना कि शाम को घर आइएगा और एक-एक चीज बताइएगा कि क्या चल रहा है, कई राजनीतिक अर्थ निकाल रहा है। बिहार की सियासत के जानकार विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक सामान्य बातचीत नहीं, बल्कि सत्ता संरचना के भीतर बदलते संतुलन का संकेत भी हो सकता है।
कैबिनेट विस्तार के बाद बढ़ी बेचैनी?
राजनीतिक जानकारों की मानें तो बिहार में हालिया कैबिनेट विस्तार के बाद सरकार के फैसलों की गति और शैली दोनों में बदलाव दिखा है। पहले जहां बड़े फैसलों में जदयू नेतृत्व की सीधी भागीदारी महसूस की जाती थी, वहीं अब भाजपा नेतृत्व अधिक सक्रिय नजर आ रहा है। एन्काउंटरों को लेकर भी पिछले दिनों सियासी माहौल गरमाया था। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या जदयू सरकार के भीतर अपनी भूमिका को लेकर अतिरिक्त सतर्क हो गई है? या फिर नीतीश कुमार यह संदेश देना चाह रहे हैं कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बावजूद राजनीतिक नियंत्रण अब भी उनके हाथ में है।
जदयू कार्यालय पहुंचकर दिया संगठनात्मक संदेश
विजय चौधरी के आवास से निकलने के बाद नीतीश कुमार सीधे जदयू कार्यालय पहुंचे। वहां उन्होंने नेताओं और कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि सबकुछ सामान्य है। गौर करें कि मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद नीतीश कुमार कम से कम 5 बार जदयू कार्यालय पहुंचकर नेताओं कार्यकर्ताओं से मेल-मुलाकात कर चुके हैं। हालांकि, राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन के तौर पर भी देख रहे हैं। माना जा रहा है कि जदयू नेतृत्व अपने कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश देना चाहता है कि पार्टी अब भी पूरी तरह सक्रिय और संगठित है।
भाजपा की दिल्ली सक्रियता ने बढ़ाई अटकलें
इधर, भाजपा खेमे की दिल्ली सक्रियता ने भी सियासी चर्चाओं को हवा दी है। कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा के दिल्ली दौरे और वहां की बैठकों को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में इसे 'मार्गदर्शन प्राप्त करने वाला' दौरा बताया और बिहार के कृषि क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की बात कही है। इस बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। बताया जा रहा है कि वहां वे शीर्ष नेताओं और अधिकारियों के साथ कई अहम बैठकों में हिस्सा ले रहे हैं। वहां से चिराग पासवान आदि बिहार के नेताओं के साथ बैठक के बाद की उनकी तस्वीरें सामने आई हैं। ऐसे में इसे बिहार में होने वाले एमएलसी चुनाव की रणनीतिक तैयारी से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि हम पार्टी के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पहले ही सार्वजनिक रूप से एमएलसी चुनाव को लेकर एनडीएम में एक सीट की डिमांड कर चुके हैं।
विपक्ष में भी बढ़ी हलचल
उधर, विपक्षी खेमे में भी गतिविधियां तेज हैं। तेजस्वी यादव के बेटे इराज के पहले जन्मदिन के मौके पर गाजियाबाद में आयोजित कार्यक्रम में परिवार की मौजूदगी को राजद में एकजुटता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इराज के बर्थडे सेलिब्रेशन में तेज प्रताप यादव मौजूद रहे थे। हालांकि, रोहिणी आचार्य की गैरमौजूदगी को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं जारी हैं। इस बीच लालू प्रसाद स्वास्थ्य जांच के लिए सिंगापुर जा रहे हैं। इसके साथ ही राजद में प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर भी अंदरखाने मंथन चल रहा है। पार्टी के भीतर कई नए नामों की चर्चा हो रही है, जिससे संगठनात्मक बदलाव की संभावनाओं को बल मिल रहा है।
आनंद मोहन के बयानों से बढ़ी सियासी गर्मी
उधर, पूर्व सांसद आनंद मोहन लगातार अपने बयानों से राजनीतिक हलचल बढ़ा रहे हैं। उनके हालिया बयान सत्ता और विपक्ष दोनों खेमों में चर्चा का विषय बने हुए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिशें अब तेज हो चुकी हैं और आने वाले विधान परिषद चुनाव से पहले सभी दल अपने-अपने आधार को मजबूत करने में जुट गए हैं। बीते साल बिहार की राजनीति में कदम रखने वाले जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। उन्होंने बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में पुरजोर तरीके से उतरने का एलान किया है। बता दें कि बांकीपुर सीट भाजपा का 40 साल से गढ़ रही है। ऐसे में देखना होगा कि आने वाले समय में प्रशांत किशोर किस तरह चुनौती पेश कर पाते हैं। कारण कि विधानसभा चुनाव में पीके की पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था। जानकारों का मानना है कि विजय सिन्हा के 'सब्जेक्ट बदल दिए जाने' वाले बयान ने भी भाजपा के लिए टेंशन बढ़ाई है। सिन्हा के इस 'दर्द' से भाजपा सतर्क है।
क्या किसी बड़े बदलाव की भूमिका तैयार हो रही?
सत्ता पक्ष में बढ़ती सक्रियता, दिल्ली दौरे, संगठनात्मक बैठकों और नेताओं के सार्वजनिक संदेशों ने यह चर्चा तेज कर दी है कि आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में कुछ बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल सभी दल सार्वजनिक तौर पर सबकुछ सामान्य होने का दावा कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चल रही हलचल संकेत दे रही है कि बिहार की सियासत दिलचस्प मोड़ ले सकती है।



