रुपये को संभालने के लिए RBI का बड़ा प्लान, गवर्नर संजय मल्होत्रा बोले- हर जरूरी कदम उठाने को तैयार

नई दिल्ली
भारतीय रुपये में उतार-चढ़ाव हो तो इसका असर सिर्फ शेयर बाजार या बड़े कारोबारियों तक सीमित नहीं रहता है. ऐसे में भारत के लिए कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरे जरूरी सामान खरीदना महंगा हो सकता है. इससे देश के आयात बिल और महंगाई पर भी असर पड़ सकता है. ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) फॉरेन करेंसी मार्केट में रुपये की चाल को व्यवस्थित रखने और जरूरत से ज्यादा सट्टेबाजी पर रोक लगाने के लिए सख्त कदम उठा रहा है. आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मनीकंट्रोल को दिए एक खास इंटरव्यू में साफ कहा है कि जरूरत पड़ने पर सेंट्रल बैंक और कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।
आरबीआई गवर्नर ने यह भी स्पष्ट किया कि हाल में उठाए गए कदमों का मकसद विदेशी निवेश को रोकना या देश से पैसा बाहर जाने पर पाबंदी लगाना नहीं है. आरबीआई चाहता है कि फॉरेन करेंसी मार्केट का इस्तेमाल उन लोगों और कंपनियों की जरूरत पूरी करने के लिए हो, जिन्हें आयात, निर्यात या दूसरे भुगतान के कारण रुपये और फॉरेन करेंसी की कीमत में बदलाव से बचाव करना है. सवाल यह है कि आरबीआई ने कौन-से नियम बदले हैं, रुपये पर इसका क्या असर हो सकता है और क्या ब्याज दरें भी बढ़ाई जा सकती हैं?
फॉरेन करेंसी मार्केट में सट्टेबाजी रोकने के लिए RBI का कदम
आरबीआई ने हाल में फॉरेन करेंसी से जुड़े कुछ नियम सख्त किए हैं. अब रद्द किए गए फॉरेन करेंसी डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट को दोबारा बुक करने पर रोक लगाई गई है. इसके अलावा, फॉरेन करेंसी मार्केट में कुछ सौदों के लिए रिजर्व रखने की जरूरत से जुड़े नियम भी बदले गए हैं. डॉक्यूमेंट्स प्रोसेस को स्पष्ट किया गया है और संबंधित लीमिट को 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर किया गया है. इन बदलावों का फोकस ऐसे डील्स पर लगाम लगाना है, जिनमें असली कारोबारी जरूरत के बजाय कीमतों में उतार-चढ़ाव से कमाई करने की कोशिश की जा रही हो।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में आरबीआई ने देखा कि फॉरेन करेंसी से जुड़े बड़ी संख्या में सौदे उसी दिन रद्द करके दोबारा बुक किए जा रहे थे. कुछ मामलों में करीब एक-तिहाई सौदे उसी दिन बंद या रद्द हो रहे थे, जिस दिन वे किए गए थे।
आरबीआई गवर्नर के अनुसार, अगर किसी कंपनी को आयात का भुगतान करने के लिए डॉलर की जरूरत है, तो वह आमतौर पर उस जरूरत से जुड़ा सौदा कुछ समय तक बनाए रखेगी. बार-बार सौदे रद्द करना और दोबारा करना सट्टेबाजी की ओर इशारा कर सकता है. इसी वजह से आरबीआई ने ये कदम उठाए हैं. हालांकि, हर सौदे को सट्टेबाजी मानना सही नहीं होगा. असली उद्देश्य जरूरत से ज्यादा और एकतरफा दांव को कम करना है।
क्या विदेशी निवेशकों के लिए पैसा लाना-ले जाना मुश्किल होगा?
आरबीआई गवर्नर ने साफ किया कि ये कदम कैपिटल कंट्रोल नहीं हैं. इसका मतलब है कि विदेशी निवेशकों के लिए भारत में निवेश करने या निवेश से पैसा निकालने पर सामान्य रूप से रोक लगाने का उद्देश्य नहीं है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारतीय शेयरों और बॉन्ड में पैसा लगा सकते हैं और जरूरत के मुताबिक उसे वापस भी ले जा सकते हैं. विदेशी निवेशक और नॉन रेसिडेंशियल अपने निवेश से जुड़े रिस्क से बचने के लिए हेजिंग भी कर सकते हैं. हेजिंग का मतलब है कि भविष्य में कीमत बदलने से होने वाले संभावित नुकसान को कम करने की व्यवस्था करना है।
आरबीआई गवर्नर का कहना है कि इन नियमों को विदेशी पूंजी के आने-जाने पर रोक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. मकसद विदेशी मुद्रा बाजार में कारोबार को व्यवस्थित रखना है।
क्या रुपये को किसी खास लेवल पर रोकना चाहता है RBI?
सोमवार को रुपये में मजबूती देखने को मिली, लेकिन गवर्नर ने कहा कि आरबीआई रुपये को किसी खास कीमत या तय दायरे में रखने का लक्ष्य नहीं बनाता. सेंट्रल बैंक की कोशिश यह है कि रुपये में अचानक और जरूरत से ज्यादा उतार-चढ़ाव न हो तथा सट्टेबाजी के कारण बाजार की सामान्य चाल प्रभावित न हो।
संजय मल्होत्रा ने कहा कि फॉरेन करेंसी मार्केट भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर जरूरत से ज्यादा निराशावादी नजर आ रहा है. उनके मुताबिक, भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत है. सेवा निर्यात और विदेश में काम करने वाले भारतीयों से आने वाला पैसा अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी अहम भूमिका निभाता है. उन्होंने उम्मीद जताई कि व्यापार समझौते, कारोबार करना आसान बनाने वाले सुधार, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएं और ऊर्जा के दूसरे स्रोतों को बढ़ावा देने जैसे कदम निर्यात को बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने में मदद करेंगे।
क्या रुपये को संभालने के लिए ब्याज दरें बढ़ेंगी?
भारतीय रुपये पर दबाव आने की स्थिति में ब्याज दरें बढ़ाने के सवाल पर गवर्नर ने कहा कि मौद्रिक नीति का मुख्य उद्देश्य महंगाई को काबू में रखना है. वित्तीय स्थिरता के रिस्क से निपटने के लिए आरबीआई के पास दूसरे नियामक और निगरानी से जुड़े उपाय भी हैं. हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ब्याज दरों और वित्तीय स्थिरता को पूरी तरह अलग नहीं रखा जा सकता. ब्याज दरों में बदलाव का असर बैंकों, कर्ज और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है, इसलिए मौद्रिक नीति बनाते समय वित्तीय स्थिरता को भी ध्यान में रखना जरूरी है. उन्होंने यह नहीं कहा कि रुपये को संभालने के लिए ब्याज दरें निश्चित रूप से बढ़ाई जाएंगी।
आगे भी कदम उठा सकता है RBI, अर्थव्यवस्था पर भरोसा
आरबीआई गवर्नर ने कहा कि आरबीआई के पास बाजार में जरूरत के मुताबिक कदम उठाने के कई ऑप्शन हैं. हाल के कुछ आरबीआई के फैसलों का शुरुआती असर पॉजिटिव दिखा है. अगर सट्टेबाजी कम करने के लिए और कदम जरूरी हुए, तो केंद्रीय बैंक उन पर विचार करेगा।
उन्होंने भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत बताया है. साथ ही, आरबीआई गवर्नर ने कहा है कि बैंक अच्छी स्थिति में हैं, कंपनियों की कमाई में सुधार के संकेत हैं और घरेलू विकास भी अच्छा बना हुआ है. इसके बावजूद, दुनिया में बदलते हालात और फॉरेन करेंसी मार्केट की चुनौतियों पर नजर रखना जरूरी है।
संजय मल्होत्रा ने कहा कि सरकार और आरबीआई मिलकर देश की भुगतान संतुलन स्थिति को मजबूत करने के लिए जरूरी कदम उठाएंगे. उनका संदेश साफ है कि रुपये की किसी खास कीमत को तय करना लक्ष्य नहीं है. कोशिश बाजार को व्यवस्थित रखने, अचानक उतार-चढ़ाव कम करने और जरूरत से ज्यादा सट्टेबाजी पर रोक लगाने की है. साथ ही, जरूरत पड़ने पर आरबीआई आगे भी कार्रवाई कर सकता है।



