विदेश

बांग्लादेश में 500 कपड़ा कारखाने बंद, 30 हजार टका वेतन की मांग पर सड़कों पर उतरे मजदूर

ढाका

बांग्लादेश एक बार फिर से उबल पड़ा है. लगभग 28 महीनों के बाद लोग सड़क पर हैं. पुलिसकर्मियों पर हमले कर रहे हैं, आगजनी और पत्थरबाजी हो रही है. देश की कई सड़के बंद हैं, लेकिन इस बार प्रदर्शन की वजह सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि कम मजदूरी है. इस बार बांग्लादेश के कपड़ा मजदूर सड़क पर हैं और सैलरी बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. इससे पहले जुलाई 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा था। 

लेकिन ये प्रदर्शन आंदोलन की तरह हो रहा है. कपड़ा मजदूर सड़कों पर निकल रहे हैं, गाड़ियां और दुकानें बंद कर रहे हैं और विरोध करने पर हिंसक हो जा रहे हैं। 

ये प्रदर्शन 31 अक्तूबर को शुरू हुए. मजदूरों ने ढाका (मिरपुर), आशुलिया, सावर, गाजीपुर जैसे औद्योगिक इलाकों में सड़कें जाम कर दी और गारमेंट फैक्ट्रियों को बंद कर दिया. प्रदर्शन और हड़ताल की वजह से लगभग 529 कारखाने प्रभावित हुए और करीब 10 लाख श्रमिक प्रभावित हुए।

कुछ जगहों पर हिंसा, आगजनी (पुलिस बॉक्स/वाहन) और तोड़फोड़ भी हुई. पुलिस ने आंसू गैस, पानी की बौछार और साउंड ग्रेनेड का इस्तेमाल किया. कुछ इलाकों में BGB भी तैनात किया गया। 

सोमवार को उम्मीद थी कि काम फिर से शुरू होगा लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। 

सोमवार को मजदूर फिर से सड़क पर आ गए. राजधानी ढाका के मिरपुर में कई गलियो में प्रदर्शन चल रहा है. मजदूर सड़कों पर हैं, कई जगहों पर टकराव की नौबत है। 

बांग्लादेश के अंग्रेजी अखबार प्रथम आलो ने रिपोर्ट किया है कि आज सोमवार को सुबह लगभग 10:45 बजे, मीरपुर-10 के सेनपारा परबटा इलाके में कुछ मजदूर एक गली से निकलकर मुख्य सड़क पर आने की कोशिश कर रहे थे. पुलिस ने उन्हें तितर-बितर करने के लिए खदेड़ा और आंसू गैस के कई गोले दागे। 

बाद में मीरपुर-2 में स्टेडियम के पास प्रोशिका चौराहे पर भी मजदूरों ने सड़क पर उतरने की कोशिश की. पुलिस ने उन्हें वहां से हटा दिया। 

प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि मजदूर रूपनगर इलाके से छोटे-छोटे समूहों में आ रहे थे और मीरपुर-2 में स्टेडियम के पास से होते हुए प्रोशिका की ओर बढ़ रहे थे। 

स्थिति अभी तनावपूर्ण बनी है. मिरपुर में मेट्रो सेवाएं प्रभावित हुई है. 

12 हजार टका में जिंदगी गुजारने की चुनौती

बांग्लादेश के कपड़ा मजदूर न्यूनतम 30000 टका मजदूरी की मांग कर रहे हैं. इस वक्त उन्हें 12 हजार टका ही मिल रहा है. मजदूरों का कहना है कि महंगाई और बढ़ती जीवन लागत (भोजन, आवास/किराया, परिवहन और स्वास्थ्य सेवा) ने उनकी क्रय शक्ति काफी घटा दी है. मौजूदा वेतन से परिवार चलाना मुश्किल हो गया है. बांग्लादेश के गार्मेंट सेक्टर में दुनिया में सबसे कम मजदूरियां मानी जाती हैं। 

आवामी लीग पर आरोप 
बांग्लादेश में गारमेंट इंडस्ट्री में जारी अशांति के पीछे सरकार ने अपदस्थ शेख हसीना सरकार से जुड़े उद्योगपतियों का हाथ होने का आरोप लगाया है. बांग्लादेश के अखबार द डेली स्टार के अनुसार गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने 2 नवंबर को कहा कि आवामी लीग से जुड़े कुछ फैक्ट्री मालिक, पूर्व सांसद, मंत्री और राज्य मंत्री कपड़ा उद्योग में अस्थिरता भड़का रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि अपदस्थ सरकार के समर्थक मजदूरों को उकसाकर हाईवे जाम, आगजनी और हिंसा करा रहे हैं. सरकार के पास इन घटनाओं से जुड़े वीडियो और ऑडियो सबूत भी हैं. मंत्री के मुताबिक, कुछ फैक्ट्री मालिकों ने जानबूझकर अपने कारखाने बंद किए ताकि हालात और बिगड़ें। 

एक की रिपोर्ट के मुताबिक, अशांति के बीच मीरपुर, सावर-अशुलिया, गाजीपुर और मैमनसिंह में कम से कम 529 कपड़ा फैक्ट्रियों ने छुट्टी घोषित कर दी थी. सरकार ने अब न्यूनतम वेतन तय करने के लिए वेतन बोर्ड गठित किया है। 

अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है गारमेंट इंडस्ट्री
बांग्लादेश की गारमेंट इंडस्ट्री उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है. रेडीमेड गारमेंट सेक्टर देश के सबसे बड़े निर्यात उद्योगों में शामिल है और विदेशी मुद्रा कमाने का सबसे बड़ा जरिया है. बांग्लादेश दुनिया के प्रमुख कपड़ा निर्यातकों में शामिल है और यूरोप, अमेरिका समेत कई बड़े बाजारों में उसके बने कपड़ों की भारी मांग है. यहां की फैक्ट्रियों में टी-शर्ट, शर्ट, ट्राउजर, जींस, जैकेट और दूसरे रेडीमेड कपड़े तैयार किए जाते हैं. इस उद्योग में लाखों लोग काम करते हैं, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है। 

2024-25 में इस सेक्टर से करीब 39.35 अरब डॉलर का निर्यात हुआ, जो देश के कुल निर्यात का 81 फीसदी से अधिक था. बांग्लादेश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेडीमेड गारमेंट निर्यातक है और इस मामले में चीन के बाद उसका स्थान है. हालांकि, यह उद्योग कई चुनौतियों से भी जूझ रहा है. मजदूरों की कम मजदूरी, कामकाज की खराब परिस्थितियां, वेतन बढ़ाने की मांग और फैक्ट्रियों में हड़ताल जैसे मुद्दे अक्सर सामने आते हैं। 

 

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