फसल से तैयार सामान बनाकर किसानों और कारोबारियों के लिए नए मौके

पंजाब का अनाज, फल, सब्जियां और दूध सिर्फ मंडी में बेचने तक सीमित नहीं हैं। इनकी सफाई, छंटाई, सही भंडारण और पैकिंग से बेहतर बाजार मिल सकता है। इनसे जूस, मसाले और दूसरे तैयार सामान बनाना खाद्य प्रसंस्करण कहलाता है। इससे किसानों को नए खरीदार और कस्बों में छोटे कारोबारों को काम मिल सकता है। मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार ने इस क्षेत्र पर खास ध्यान देते हुए अलग नीति जारी की है।
पंजाब की खाद्य प्रसंस्करण नीति के सरकारी नियम 8 मार्च 2026 को जारी हुए। शर्तें पूरी करने वाली इकाइयों के लिए अलग-अलग लाभों की कुल अधिकतम सीमा तय की गई है। यह जमीन, भवन और मशीनों जैसी स्थायी संपत्ति पर हुए निवेश का 125 प्रतिशत या 500 करोड़ रुपये, दोनों में जो कम हो, उतनी है। यह सभी योग्य लाभों की ऊपरी सीमा है। वास्तव में कितनी मदद मिलेगी, यह परियोजना और मंजूरी की शर्तों से तय होगा।
नीति में कच्चा माल खरीदने वाली योग्य इकाइयों के लिए मंडी शुल्क, बाजार शुल्क, ग्रामीण विकास शुल्क और कुछ दूसरे राज्य करों में 5 साल तक छूट की व्यवस्था है। पंजाब से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदे जाने वाले गेहूं और धान के अलावा दूसरे कृषि उत्पादों की खरीद को भी मदद से जोड़ा गया है। किसानों को इसका असली फायदा तभी मिलेगा, जब खरीद निष्पक्ष हो, खरीदार उपलब्ध हों और भुगतान समय पर हो।
फाजिल्का जिले के आलमगढ़ में इस दिशा में काम हुआ है। 19 फरवरी 2026 को कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां ने पंजाब एग्री एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन, यानी पैग्रेक्सको, की तीन परियोजनाओं में बढ़ाई गई सुविधाओं का उद्घाटन किया। इनमें मिर्च और किन्नू से तैयार उत्पाद बनाने वाली इकाइयां तथा नियंत्रित माहौल में पौधे तैयार करने वाली आधुनिक नर्सरी शामिल हैं। इनका मकसद किसानों की उपज को बाजार से जोड़ना है।
आलमगढ़ की मिर्च इकाई की क्षमता 1 मीट्रिक टन से बढ़ाकर 4 मीट्रिक टन प्रति घंटा करने की जानकारी दी गई। किन्नू इकाई में स्वाद और गुणवत्ता बेहतर करने वाली मशीनें तथा छिलकों से तेल निकालने की सुविधा जोड़ी गई। नर्सरी में सालाना पौधे तैयार करने की क्षमता 16 लाख से बढ़ाकर 40 लाख करने की योजना भी बताई गई। ये आंकड़े क्षमता और योजनाओं की जानकारी देते हैं। किसानों की कमाई पर असर समझने के लिए वास्तविक खरीद और भुगतान देखना होगा।
ऐसी एक इकाई से कई लोगों का काम जुड़ता है। किसान फसल उगाता है, चालक उसे फैक्ट्री तक ले जाता है, मशीन चलाने वाला तैयार सामान बनाता है और दुकानदार उसे बेचता है। दूध, फल और सब्जियों से जुड़े छोटे कारोबार गांवों के युवाओं और महिलाओं के लिए मौके बना सकते हैं। इसके लिए सामान की गुणवत्ता की जांच और उसे बेचने की व्यवस्था भी जरूरी है।
केवल छूट देने से फसल की बर्बादी नहीं रुकेगी। उपज को ठंडा और सुरक्षित रखने की सुविधा, भरोसेमंद बिजली, सही ढुलाई और प्रशिक्षण भी चाहिए। किसानों से खरीद का काम भी ठीक से होना चाहिए। भगवंत मान सरकार की नीति का फायदा इन्हीं सुविधाओं और वास्तव में शुरू होने वाले कामों से समझ में आएगा।
आलमगढ़ की इकाइयों में बढ़ी सुविधाओं और 2026 की नीति का मकसद स्थानीय उपज के लिए बेहतर बाजार बनाना है। पुराने केंद्रों में मशीनें और सुविधाएं बढ़ाई जा रही हैं, जबकि नया कारोबार शुरू करने वालों के लिए मदद के नियम तय किए गए हैं। इकाइयां नियमित खरीद करें, किसान को समय पर पैसा मिले और तैयार सामान के ग्राहक बढ़ें, तभी इन प्रयासों का लाभ खेतों और कस्बों तक पहुंचेगा।



