
जयपुर
राजस्थान में पुलिस और आम जनता के बीच बेहतर तालमेल, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और आपराधिक गतिविधियों पर लगाम कसने के उद्देश्य से गठित सामुदायिक संपर्क समूहों (CLG – Community Liaison Group) की व्यवस्था में भजनलाल सरकार ने एक बड़ा और नीतिगत बदलाव किया है। गृह विभाग की ओर से जारी आधिकारिक अधिसूचना के तहत अब राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े संगठनों के कार्यकर्ता भी थाना व पंचायत स्तर पर गठित होने वाली सीएलजी समितियों के सदस्य बन सकेंगे। राज्य सरकार ने राजस्थान पुलिस नियम, 2008 के नियम 12(5) के क्लॉज (सी) को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है, जिसके तहत पहले किसी भी राजनीतिक दल के सक्रिय कार्यकर्ताओं या पदाधिकारियों के सीएलजी सदस्य बनने पर स्पष्ट पाबंदी लगी हुई थी। इस फैसले के बाद प्रदेश भर के थानों में स्थानीय स्तर पर सामाजिक व राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदलने के आसार हैं और जमीनी स्तर पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं को पुलिस प्रशासन के साथ सीधे संवाद का एक नया मंच मिल गया है।
गृह विभाग द्वारा 19 जुलाई को जारी अधिसूचना के बाद राजस्थान की पुलिसिंग और प्रशासनिक व्यवस्था में एक नई बहस छिड़ गई है।
नियम 12(5)(सी) को हटाया गया
साल 2008 में तत्कालीन भाजपा (वसुंधरा राजे) सरकार के दौरान बने राजस्थान पुलिस नियमों में यह प्रावधान जोड़ा गया था कि सीएलजी को पूरी तरह गैर-राजनीतिक और निष्पक्ष रखा जाएगा।
राजनीतिक कार्यकर्ताओं को रास्ता साफ
अब इस प्रतिबंधात्मक क्लॉज को हटा दिए जाने के बाद सत्ताधारी दल सहित सभी राजनीतिक दलों से जुड़े स्थानीय नेता, कार्यकर्ता और सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमियों वाले लोग सीएलजी सदस्यता के लिए आधिकारिक रूप से पात्र हो गए हैं।
संगठन स्तर पर नई जिम्मेदारी
राजनीतिक विश्लेषक इसे सरकार द्वारा जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को प्रशासनिक सहयोग और सामाजिक पहचान देने की एक बड़ी पहल के रूप में देख रहे हैं।
क्या काम करती है सीएलजी?
आम नागरिकों और पुलिस प्रशासन के बीच थाना स्तर पर सामंजस्य बनाने में सीएलजी सदस्यों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। सीएलजी सदस्य स्थानीय स्तर पर शांति व्यवस्था बनाए रखने, त्योहारों व धार्मिक जुलूसों के दौरान सौहार्द कायम करने, प्राकृतिक आपदाओं के समय सहायता पहुंचाने और अपराध नियंत्रण में पुलिस को गोपनीय सुझाव देने का काम करते हैं।
वर्तमान में राजस्थान के सभी पुलिस थानों और पंचायतों में मिलाकर 75 हजार से अधिक सीएलजी सदस्य सक्रिय हैं। नियम के अनुसार प्रत्येक पंचायत स्तर पर 5 सदस्य और थाना स्तर पर 30 सदस्य नियुक्त करने का प्रावधान है। इन सदस्यों की नियुक्ति संबंधित थाना अधिकारी (SHO) और वृत्ताधिकारी (CO) की सिफारिश पर जिला पुलिस अधीक्षक (SP) द्वारा की जाती है।
फैसले पर गर्माई सियासत
सरकार के इस आदेश के सार्वजनिक होते ही राजस्थान के राजनीतिक हलकों में तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इस निर्णय का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि भाजपा और आरएसएस के लोग अब थानों में सीधी एंट्री लेकर कानून-व्यवस्था को प्रभावित करना चाहते हैं। इससे पुलिस की निष्पक्षता और जनता का भरोसा दोनों खत्म होगा।
भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि सीएलजी में समाज के सभी वर्गों और राजनीतिक वर्ग का भी संतुलित प्रतिनिधित्व होना चाहिए। ऐसे लोगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जिनकी सोच सकारात्मक हो और जो समाज में आपसी तालमेल बिठा सकें।
क्या निष्पक्ष पुलिसिंग पर पड़ेगा असर?
गृह विभाग के इस आदेश के बाद अब जिला स्तर पर पुलिस कप्तानों (SP) को नई सीएलजी समितियों के गठन के दौरान नए मापदंडों का पालन करना होगा। कुछ पूर्व पुलिस अधिकारियों और प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं की सीधी एंट्री से कई मामलों में स्थानीय पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं और आपसी गुटबाजी थानों तक पहुंच सकती है।
वहीं सरकार से जुड़े लोगों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर जनसमस्याओं को उठाने और पुलिस व जनता के बीच पुल का काम करने में राजनीतिक व सामाजिक रूप से सक्रिय कार्यकर्ताओं का अनुभव काफी मददगार साबित होगा।



