बिहार/झारखंडराज्य

15 साल पुराना विवाह खत्म, पटना हाईकोर्ट ने लंबे अलगाव को माना मानसिक क्रूरता

पटना
 पटना हाईकोर्ट ने करीब 15 साल पुराने वैवाहिक संबंध को समाप्त करते हुए लंबे समय से चले आ रहे अलगाव और वैवाहिक तनाव को मानसिक क्रूरता के दायरे में माना है।

न्यायाधीश बिबेक चौधरी और न्यायाधीश राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने कुमारी सौम्या की अपील स्वीकार करते हुए मुजफ्फरपुर फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया। दोनों का विवाह वर्ष 2009 में हुआ था और अप्रैल 2019 से अलग रह रहे थे।

वर्षों के अलगाव से व्यावहारिक रूप से टूट चुका था वैवाहिक बंधन
हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक मंजूर किया। कोर्ट ने कहा कि वर्षों तक जारी अलगाव, लगातार तनाव और वैवाहिक संबंधों का पुनर्स्थापित न हो पाना इस निष्कर्ष की ओर ले जाता है कि वैवाहिक बंधन व्यावहारिक रूप से टूट चुका है। इसी आधार पर वैवाहिक संबंध समाप्त करने का निर्णय लिया गया।

पति के व्यभिचार के आरोप को कोर्ट ने नहीं माना
मामले में पति की ओर से पत्नी पर व्यभिचार के आरोप भी लगाए गए थे। हालांकि हाईकोर्ट ने ठोस साक्ष्य नहीं होने के कारण इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोप पर्याप्त नहीं हैं, उसके समर्थन में विश्वसनीय प्रमाण भी जरूरी हैं।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी दिया हवाला
खंडपीठ ने मानसिक क्रूरता और वैवाहिक संबंधों से जुड़े अपने निष्कर्ष के लिए सुप्रीम कोर्ट के शोभा रानी बनाम मधुकर रेड्डी (1988) और समर घोष बनाम जया घोष (2007) के फैसलों का भी उल्लेख किया। इन निर्णयों के संदर्भ में वैवाहिक जीवन में लंबे तनाव और अलगाव के प्रभाव पर विचार किया गया।

पत्नी को मिलेगा 71.66 लाख रुपये स्थायी भरण-पोषण
हाईकोर्ट ने पत्नी के लिए 71.66 लाख रुपये स्थायी भरण-पोषण निर्धारित किया है। अदालत ने यह राशि तय करते समय पति की करीब 3.70 लाख रुपये मासिक आय और बच्चों समेत परिवार की आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखा। भुगतान दो बराबर किश्तों में किया जाना है।

तीन और छह महीने में चुकानी होगी राशि
अदालत के निर्देश के अनुसार भरण-पोषण की राशि दो बराबर किश्तों में दी जाएगी। पहली किश्त तीन महीने और दूसरी छह महीने के भीतर भुगतान करनी होगी। राशि का भुगतान पूरा होने के बाद दोनों पक्ष लंबित मुकदमों को वापस लेने की प्रक्रिया पूरी करेंगे।

लंबे अलगाव पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
फैसले में हाईकोर्ट ने माना कि लगातार वर्षों तक अलग रहना, वैवाहिक तनाव बने रहना और संबंधों के सामान्य स्थिति में लौटने की संभावना समाप्त होना मानसिक क्रूरता के निष्कर्ष तक पहुंचा सकता है। वहीं व्यभिचार जैसे गंभीर आरोपों के लिए ठोस प्रमाण की आवश्यकता पर भी अदालत ने जोर दिया।

 

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