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NCERT की नई 8वीं किताब में बड़ा बदलाव, हिटलर का जिक्र हटा, सावरकर को मिली जगह; पार्टिशन पर कांग्रेस के रुख में भी बदलाव

  नई दिल्ली

न्यायपालिका पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर विवादों में रही NCERT की कक्षा 8वीं की सोशल साइंस की किताब आखिरकार नए संशोधनों के साथ दोबारा जारी कर दी गई है. लेकिन इस बार सिर्फ न्यायपालिका वाले विवादित हिस्से को ही नहीं सुधारा गया है, बल्कि इतिहास के पन्नों में भी कई बड़े और महत्वपूर्ण फेरबदल किए गए हैं। 

संशोधित किताब "Exploring Society: India and Beyond" में 1947 के विभाजन पर कांग्रेस के स्टैंड को बदला गया है, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संदर्भ से 'हिटलर' का नाम हटा दिया गया है, और वीर सावरकर की 'स्वराज' की मांग को पाठ्यक्रम में जोड़ा गया है। 

विभाजन और कांग्रेस: 'मजबूरी' वाला वाक्य हटाया
किताब के इतिहास अध्याय "India's Long Road to Independence" में भारत के विभाजन को लेकर बड़ा बदलाव हुआ है। 

क्या बदला: नई किताब में लिखा गया है कि विभाजन का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा भी व्यापक रूप से विरोध किया गया था और क्या इसे स्वीकार करना ही एकमात्र रास्ता था, यह आज भी बहस का विषय है। 

क्या हटाया: पुरानी किताब से वह वाक्य पूरी तरह हटा दिया गया है जिसमें लिखा था कि 'विभाजन के दौरान जब उपमहाद्वीप में सांप्रदायिक कत्लेआम मच रहा था, तब कांग्रेस नेता बेबस/लाचार थे। 

पुरानी थ्योरी: वापस ली गई किताब में पहले लिखा था कि हिंदू और मुस्लिम नेताओं के मतभेदों का फायदा उठाकर अंग्रेजों ने भारत के विभाजन का फैसला किया, और हालांकि महात्मा गांधी और अधिकांश कांग्रेस नेताओं ने इसका विरोध किया था, लेकिन अंत में उन्होंने इसे एकमात्र रास्ता मानकर स्वीकार कर लिया। 

2. नेताजी के संदर्भ से हिटलर और नाजी विचारधारा गायब
आजाद हिंद फौज के गठन को लेकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े संदर्भों में भी शब्दों को बदला गया है। 

अब क्या लिखा है: नई किताब में केवल इतना कहा गया है कि नेताजी ने सेना खड़ी करने के लिए ब्रिटिश विरोधी ताकतों से समर्थन मांगा था। 

क्या हटाया: पुरानी किताब में साफ तौर पर लिखा था कि नेताजी ने 'हिटलर' से मदद मांगी थी और हिटलर को एक ऐसे 'तानाशाह' के रूप में परिभाषित किया गया था जिसकी 'नस्लवादी नाजी विचारधारा और विस्तारवादी लक्ष्यों' के कारण दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ था. अब नए एडिशन से हिटलर और नाजी विचारधारा के ये सारे संदर्भ हटा दिए गए हैं.

3. वीर सावरकर और 'स्वराज' की एंट्री
संशोधित पाठ्यक्रम में देश की आजादी के आंदोलनों का दायरा बढ़ाते हुए स्वतंत्रता सेनानी वी.डी. सावरकर के योगदान को भी जोड़ा गया है. किताब में अब जिक्र है कि साल 1925 में वी.डी. सावरकर द्वारा भी इसी तरह की 'स्वराज' की मांग उठाई गई थी। 

बंटवारे और न्यायपालिका से जुड़े अध्यायों में हुए अहम बदलाव
एनसीईआरटी की संशोधित पाठ्यपुस्तक में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। नई किताब से कुछ विवादित हिस्सों, अदालतों में लंबित मामलों और दो प्रमुख न्यायिक फैसलों के संदर्भ हटा दिए गए हैं। वहीं, जनहित याचिका (PIL), ट्रिब्यूनल और विवादों के वैकल्पिक समाधान तंत्र से जुड़ी नई जानकारी को शामिल किया गया है, ताकि छात्रों को न्यायिक व्यवस्था की व्यापक समझ मिल सके।

इतिहास के अध्याय "India's Long Road to Independence" में भी बदलाव किए गए हैं। संशोधित संस्करण में कहा गया है कि देश के विभाजन का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी व्यापक रूप से विरोध किया था और यह सवाल कि क्या विभाजन आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता था, आज भी बहस का विषय बना हुआ है। इसके साथ ही, पुरानी पाठ्यपुस्तक का वह वाक्य हटा दिया गया है जिसमें कहा गया था कि विभाजन के दौरान उपमहाद्वीप में हुए सांप्रदायिक नरसंहार के समय कांग्रेस नेता असहाय थे।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद क्या बदला?
    नए संस्करण में वह वाक्य हटा दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि विभाजन के दौरान सांप्रदायिक हिंसा पर कांग्रेस नेता असहाय थे।

    पहले की किताब में लिखा था कि अंग्रेजों ने हिंदू-मुस्लिम मतभेदों का फायदा उठाकर भारत का विभाजन किया और कांग्रेस ने अंततः इसे स्वीकार किया।

    संशोधित पाठ्यपुस्तक में जोड़ा गया है कि वी.डी. सावरकर ने भी 1925 में स्वराज की मांग उठाई थी।

    पुराने संस्करण में नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा सेना खड़ी करने के लिए हिटलर से समर्थन मांगने का उल्लेख था।

    हिटलर को "नस्लवादी नाजी विचारधारा वाला तानाशाह" बताने वाला हिस्सा भी हटाया गया है।

    नई किताब में केवल यह कहा गया है कि बोस ने "ब्रिटिश विरोधी ताकतों" से समर्थन मांगा था।

    संशोधित संस्करण से हिटलर और नाजी विचारधारा के सभी संदर्भ हटा दिए गए हैं।

    फरवरी में न्यायपालिका से जुड़े अध्याय पर विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया था।

    अदालत ने पुस्तक की भौतिक और डिजिटल प्रतियां वापस लेने तथा आगे के प्रकाशन पर रोक लगाने का आदेश दिया था।

    नई पाठ्यपुस्तक की भूमिका में कहा गया है कि इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और समीक्षा प्रक्रिया के बाद प्रकाशित किया गया है।

इसमें यह भी बताया गया है कि 16 मार्च के आदेश के जरिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा बनाई गई विशेषज्ञों की एक समिति ने चौथे अध्याय, "समाज में न्यायपालिका की भूमिका" (The Role of the Judiciary in Society), को "फिर से लिखा" था।

वापस ली गई पाठ्यपुस्तक की विकास टीम में 51 सदस्य शामिल थे। संशोधित संस्करण में 48 सदस्य हैं, जिनमें से तीन लोगों – मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार – के नाम हटा दिए गए हैं, जिन्हें शुरू में इस अध्याय के लिए जिम्मेदार माना गया था।

नई किताब में सावरकर का जिक्र
नई किताब में पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की कहानी को और बड़ा किया गया है. इसमें जोड़ा गया है कि इसी तरह की स्वराज की मांग 1925 में वीडी सावरकर ने भी की थी. पुरानी किताब में लिखा था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सेना बनाने के लिए हिटलर से समर्थन मांगा था और जर्मन नेता को एक तानाशाह के रूप में बताया गया था, जिसकी नस्लवादी नाजी विचारधारा और विस्तारवादी लक्ष्यों के कारण दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ था. अब हिटलर और नाजी विचारधारा का जिक्र हटाकर सिर्फ ये लिखा गया है कि बोस ने ब्रिटिश विरोधी ताकतों से समर्थन मांगा था। 

सुप्रीम कोर्ट से मांगी थी माफी 
NCERT ने 8वीं की इस किताब के लिए सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगी थी, वहीं सभी डिजिटल और हार्ड कॉपियों को वापस ले लिया था. अब तमाम बदलावों के साथ किताब को फिर से जारी किया गया है. पुरानी किताब को तैयार करने वाली टीम में 51 सदस्यों के नाम थे, जबकि इस बार जो बुक जारी हुई है, उसमें 48 नाम ही हैं. इस टीम से मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार के नाम हटा दिए गए हैं, जिन्हें शुरुआत में उस विवादित चैप्टर के लिए जिम्मेदार माना गया था। 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुआ एक्शन
यह पूरा विवाद इसी साल फरवरी में तब शुरू हुआ था जब कक्षा 8वीं की इस किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और मुकदमों के लंबित होने को लेकर कुछ टिप्पणियां की गई थीं. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जिसके बाद कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए इसकी छपाई और डिजिटल वितरण पर 'पूर्ण प्रतिबंध' लगा दिया था. इसके बाद NCERT ने माफी मांगते हुए बाजार और डिजिटल प्लेटफॉर्म से किताबें वापस ले ली थीं। 

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा गठित एक एक्सपर्ट कमेटी ने अब अध्याय 4 यानी 'द रोल ऑफ द जुडिशियरी इन सोसाइटी' को पूरी तरह से दोबारा लिखा है. नए चैप्टर में विवादित हिस्सों को हटाकर जनहित याचिका (PIL), ट्रिब्यूनल्स और वैकल्पिक विवाद निवारण तंत्र (Alternative Dispute Resolution) जैसी नई जानकारियां जोड़ी गई हैं। 

टीम से हटे 3 नाम: किताब को तैयार करने वाली पुरानी टीम में जहां 51 सदस्य थे, वहीं इस संशोधित संस्करण में 48 सदस्य ही हैं. पहले विवाद के घेरे में आए तीन विशेषज्ञों यानी मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक 
प्रसन्ना कुमार के नाम इस नई सूची से हटा दिए गए हैं। 

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