बिहार/झारखंडराज्य

CJI सूर्यकांत बोले- शांतिपूर्ण प्रदर्शन छात्रों का मौलिक अधिकार, पुलिस बल प्रयोग पर अदालतें नहीं रहेंगी मूकदर्शक

पटना
भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत (CJI Suryakant) ने शनिवार को कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाना और विरोध-प्रदर्शन करना छात्रों का मौलिक अधिकार है।

यदि पुलिस या प्रशासन बल प्रयोग कर उनकी आवाज दबाने का प्रयास करता है, तो अदालतें कतई मूकदर्शक नहीं रहेंगी।

चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (CNLU) पटना के अशोक ऑडिटोरियम में आयोजित  'ओपन हाउस' संवाद के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह बात कही।

शांत‍िपूर्ण प्रदर्शन पर पुल‍िस क्‍यों करती है कार्रवाई?
संवाद के दौरान विधि की एक छात्रा ने परिसरों में होने वाले शांतिपूर्ण आंदोलनों पर पुलिस काईवाई का मुद्दा उठाया। छात्रा का सीधा सवाल था कि जब छात्र अपने हकों के लिए शांतिपूर्ण तरीके से सड़क पर उतरते हैं, तो पुलिस बल प्रयोग करती है, ऐसे में न्यायपालिका उनके अधिकारों की रक्षा के लिए क्या कर रही है?

उत्तर देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक, विशेषकर युवाओं को अपनी असहमति जताने और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है।

उन्होंने संकेत दिया कि अदालतें छात्रों के इस संवैधानिक अधिकार की किसी भी परिस्थिति में उपेक्षा नहीं करेंगी। मुख्य न्यायाधीश ने जवाब से यह साफ किया कि यदि छात्र लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण दायरे में रहकर अपना आंदोलन चला रहे हैं, तो राज्य की कोई भी पुलिस मशीनरी उनके मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकती।

अदालतों के दरवाजे ऐसे मामलों में छात्रों के अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा खुले हैं। मुख्य न्यायाधीश ने युवा अधिवक्ताओं, विशेषकर प्रथम पीढ़ी के विधि व्यवसायियों के समक्ष आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को भी स्वीकार किया।

प्रोफेशनल असिस्‍टेंस कॉरपस की जरूरत
सारिका त्यागी के मामले का उल्लेख करते हुए उन्होंने युवा अधिवक्ताओं को उनके प्रारंभिक व्यावसायिक वर्षों में वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए एक समर्पित Professional Assistance Corpus की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने इसे किसी प्रकार की दानशीलता के रूप में नहीं, बल्कि विधि व्यवसाय के भविष्य के लिए एक आवश्यक संरचनात्मक व्यवस्था के रूप में देखने की आवश्यकता बताई

सीएनएलयू के कुलपति प्रो. फैजान मुस्तफा ने विधि शिक्षा में एक महत्वपूर्ण सुधार का प्रस्ताव रखते हुए पांच वर्षीय विधि पाठ्यक्रम को चार वर्ष की शैक्षणिक अवधि में पुनर्संरचित करने तथा अंतिम वर्ष को अनिवार्य न्यायलीय अप्रेंटिसशिप के रूप में निर्धारित करने का सुझाव दिया।

उनका प्रस्ताव था कि इस प्रकार न्यायालीय अनुभव को विधि शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाया जा सकता है और न्यायिक सेवा परीक्षाओं के लिए पृथक एक वर्षीय प्रैक्टिस की आवश्यकता को समाप्त किया जा सकता है।

इस प्रस्ताव को मुख्य न्यायाधीश ने “एक नया और स्वागत योग्य विचार” बताया। कार्यक्रम के दौरान सीएनएलयू के कुलसचिव प्रो. एसपी सिंह मौजूद रहे।

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