बिहार/झारखंडराज्य

झारखंड में निजी अस्पतालों के ICU इलाज पर नई व्यवस्था, एक समान होंगी दरें

 रांची
राज्य सरकार निजी अस्पतालों में गंभीर मरीजों के इलाज और रेफरल व्यवस्था में बड़ा बदलाव होगा। नई स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) के तहत राज्य के निजी अस्पतालों में आइसीयू उपचार की दरों को एक समान करने की योजना बनाई है।

उद्देश्य यह है कि आर्थिक कारणों से इलाज बीच में न रुके और मरीजों को गंभीर अवस्था में रिम्स या सदर अस्पताल रेफर करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सके। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार वर्तमान व्यवस्था में कई निजी अस्पताल मरीजों का प्रारंभिक इलाज करने के बाद, जब स्वजन इलाज का खर्च वहन करने में असमर्थ हो जाते हैं, तब उन्हें सरकारी अस्पतालों में रेफर कर देते हैं।

इससे रिम्स और सदर अस्पताल की इमरजेंसी पर अचानक गंभीर मरीजों का दबाव बढ़ जाता है। परिणामस्वरूप नए गंभीर मरीजों को समय पर बेड और वेंटिलेटर उपलब्ध कराना मुश्किल हो जाता है। रिम्स शासी परिषद की हालिया बैठक में भी इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा हुई।

स्वास्थ्य मंत्री डा. इरफान अंसारी ने संकेत दिया कि सरकार ऐसी व्यवस्था लागू करेगी, जिसमें निजी अस्पतालों में आइसीयू उपचार की दरों में अनावश्यक अंतर समाप्त होगा। इससे मरीजों का इलाज अपेक्षाकृत कम खर्च में हो सकेगा और रेफरल केवल चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर होगा, आर्थिक मजबूरी के कारण नहीं।

70 प्रतिशत से अधिक गंभीर मरीज रेफर होकर पहुंचते हैं रिम्स
रिम्स प्रबंधन के अनुसार संस्थान में भर्ती होने वाले 70 प्रतिशत से अधिक गंभीर मरीज निजी अस्पतालों से रेफर होकर आते हैं। इनमें अधिकांश मरीज शाम से देर रात के बीच पहुंचते हैं, जब इमरजेंसी विभाग में पहले से ही मरीजों का अत्यधिक दबाव रहता है।

ऐसे समय एक साथ सभी मरीजों को आइसीयू बेड या वेंटिलेटर उपलब्ध कराना चुनौती बन जाता है। रिम्स के चिकित्सकों का कहना है कि कई मरीज ऐसी अवस्था में पहुंचते हैं, जब उनकी हालत काफी बिगड़ चुकी होती है। इससे इलाज की जटिलता बढ़ जाती है और मृत्यु दर पर भी असर पड़ता है।

पहले भी बनी थी एसओपी, लेकिन नहीं दिखा असर
निजी अस्पतालों से अनियंत्रित रेफरल रोकने के लिए इससे पहले जिला प्रशासन, रिम्स प्रबंधन और निजी अस्पतालों के बीच एसओपी बनाई गई थी। रिम्स के जनसंपर्क पदाधिकारी डाॅ. शिशिर कुमार के अनुसार, उस एसओपी के तहत किसी भी निजी अस्पताल को मरीज रेफर करने से पहले रिम्स प्रबंधन को सूचना देनी थी।

साथ ही मरीज को रेफर करने का कारण, उसकी वर्तमान चिकित्सीय स्थिति, अब तक दिए गए उपचार और दवाओं का पूरा विवरण साझा करना अनिवार्य किया गया था। इसके बाद ही रेफरल पर सहमति दी जानी थी।

हालांकि, व्यवहारिक स्तर पर यह व्यवस्था प्रभावी साबित नहीं हो सकी। आज भी बड़ी संख्या में गंभीर मरीज सीधे रेफर होकर रिम्स पहुंच रहे हैं और पूर्व निर्धारित प्रक्रिया का पूर्ण पालन नहीं हो रहा है।

इमरजेंसी पर बढ़ता है अतिरिक्त दबाव
रिम्स के डाक्टरों का कहना है कि निजी अस्पतालों से लगातार बढ़ रहे रेफरल का सीधा असर सरकारी अस्पतालों की इमरजेंसी सेवाओं पर पड़ता है। पहले से सीमित संसाधनों के बीच अचानक बड़ी संख्या में गंभीर मरीज पहुंचने से आईसीयू, वेंटिलेटर, आक्सीजन सपोर्ट और विशेषज्ञ चिकित्सकों पर अतिरिक्त दबाव बनता है।

इससे पहले से भर्ती मरीजों के साथ-साथ नए मरीजों को भी समय पर उपचार मिलने में कठिनाई होती है। स्वास्थ्य मंत्री का मानना है कि यदि नई व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है तो निजी और सरकारी अस्पतालों के बीच रेफरल प्रणाली अधिक पारदर्शी बनेगी।

इससे एक ओर मरीजों का आर्थिक बोझ कम होगा, वहीं दूसरी ओर रिम्स जैसे सरकारी संस्थानों में संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा। रेफरल व्यवस्था को व्यवस्थित करना राज्य की आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

सरकार की नई व्यवस्था से क्या होगा फायदा

  • राज्य के निजी अस्पतालों में आईसीयू उपचार की दरों को तर्कसंगत और एकरूप बनाया जाएगा।
  • आर्थिक कारणों से मरीजों को बीच इलाज में रेफर करने की प्रवृत्ति कम होगी।
  • रेफरल केवल चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर होगा।
  • मरीज की पूरी मेडिकल हिस्ट्री डिजिटल अथवा निर्धारित प्रारूप में सरकारी अस्पताल को उपलब्ध कराई जाएगी।
  • सरकारी अस्पतालों की इमरजेंसी पर अनावश्यक दबाव कम होगा।
  • गंभीर मरीजों को समय पर आईसीयू बेड और वेंटिलेटर उपलब्ध कराने में सुविधा होगी।
  • स्वास्थ्य व्यवस्था में संतुलन लाने की कोशिश

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